उन्नाव रेप केस: सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर की जमानत के खिलाफ CBI की याचिका में पीड़िता को सुनवाई का अधिकार दिया
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्नाव रेप मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पीड़िता को मामले में पक्षकार (इम्पलीडमेंट) बनाए जाने की अनुमति दे दी और कहा कि उसे इस मामले में सुने जाने का अधिकार है।
हालांकि, अदालत ने पीड़िता के चचेरे भाई द्वारा दायर हस्तक्षेप याचिका को खारिज कर दिया। यह आवेदन पीड़िता के पिता के भाई के नाबालिग बेटे की ओर से दायर किया गया था, जिसमें कहा गया था कि यदि पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत मिलती है तो उसकी जान और स्वतंत्रता को खतरा हो सकता है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि आवेदक को इस याचिका में हस्तक्षेप करने के बजाय स्वतंत्र कानूनी उपाय अपनाना चाहिए। अदालत ने उसे जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का रुख करने की छूट देते हुए उसकी याचिका का निस्तारण कर दिया।
इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता को मामले में पक्षकार बनाए जाने की अनुमति देते हुए कहा कि उसे न्यायिक कार्यवाही में अपनी बात रखने का अधिकार है, जैसा कि लखीमपुर खीरी मामले के फैसले में भी कहा गया था।
हालांकि, अदालत ने आज सीबीआई की याचिका पर विस्तृत सुनवाई नहीं की क्योंकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता उपलब्ध नहीं थे। सेंगर की ओर से सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की और कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई उनकी स्वतंत्रता फिलहाल सीमित हो गई है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जल्द ही सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।
दरअसल, अदालत सीबीआई की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें उन्नाव रेप मामले में दोषी करार दिए गए पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित कर उन्हें जमानत दे दी गई थी।
पृष्ठभूमि
सेंगर को 2019 में एक विशेष सीबीआई अदालत ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। यह मामला देशभर में काफी चर्चा में रहा था, जिसमें पीड़िता और उसके परिवार ने सेंगर और उसके सहयोगियों पर लगातार उत्पीड़न और धमकी देने के आरोप लगाए थे। इस मामले से जुड़े कई अन्य प्रकरणों की भी जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने की थी।
सेंगर को 2020 में पीड़िता के पिता की मौत से जुड़े एक अलग मामले में 10 साल की सजा भी सुनाई गई थी।
पिछले साल दिसंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर की सजा निलंबित करते हुए उन्हें जमानत दे दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि POCSO अधिनियम की धारा 5(c) और भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2) के तहत लागू होने वाले “सार्वजनिक सेवक” की परिभाषा में विधायक (MLA) शामिल नहीं होते, इसलिए इन धाराओं के तहत अपराध को “गंभीर (aggravated) अपराध” नहीं माना जा सकता।
इस फैसले को चुनौती देते हुए सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हाईकोर्ट की यह व्याख्या POCSO अधिनियम के उद्देश्य को कमजोर करती है। सीबीआई का तर्क है कि यह कानून बच्चों को यौन अपराधों से विशेष सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है और सत्ता या पद के दुरुपयोग को एक गंभीर परिस्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए।
सीबीआई ने यह भी कहा कि लंबे समय तक जेल में रहना अपने आप में आजीवन कारावास की सजा निलंबित करने का आधार नहीं हो सकता, खासकर ऐसे मामलों में जहां अपराध नाबालिग के साथ बलात्कार जैसा गंभीर अपराध हो। एजेंसी ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मामलों में कह चुका है कि आजीवन कारावास के मामलों में सजा का निलंबन अपवाद है, नियम नहीं, और यह केवल दुर्लभ तथा विशेष परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए।