क्या महाराष्ट्र में तय छात्र-शिक्षक अनुपात RTE Act के खिलाफ है? सुप्रीम कोर्ट करेगा जांच
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें महाराष्ट्र राज्य द्वारा बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के तहत जारी 2024 के एक सरकारी प्रस्ताव (जीआर) को चुनौती दी गई। जीआर के अनुसार, राज्य ने महाराष्ट्र राज्य के प्राइमरी, अपर प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों में स्टूडेंट्स की संख्या के आधार पर शिक्षकों के पदों को मंज़ूरी देने के मानदंडों में बदलाव किया।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने 23 जनवरी को महाराष्ट्र राज्य और शिक्षा आयुक्त को नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता, जो कि निजी शिक्षण संस्थानों का एक संघ है, उसने 15 मार्च, 2024 के GR को RTE एक्ट के उद्देश्य को विफल करने वाला बताते हुए चुनौती दी।
याचिकाकर्ता ने कहा कि RTE Act के तहत अनुसूची के कॉलम I के अनुसार, शिक्षकों की संख्या प्रत्येक कक्षा/डिवीजन के लिए है, न कि प्रत्येक सेक्शन के लिए, जैसा कि राज्य सरकार ने गलती से समझा है। RTE Act की अनुसूची के तहत पहली से पांचवीं कक्षा के लिए छात्र-शिक्षक अनुपात 30-40:1 है, जबकि छठी से आठवीं कक्षा के लिए यह 35:1 है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, जीआर छात्र-शिक्षक अनुपात के संबंध में RTE Act की अनुसूची की नीति और वैधानिक योजना के विपरीत है। इसके अलावा, अनुसूची में संशोधन करने की शक्ति केवल धारा 20 के तहत भारत सरकार के पास है। ऐसी शक्तियों का प्रयोग राज्य सरकार द्वारा नहीं किया जा सकता।
यह तर्क दिया गया कि उक्त जीआर का परिणाम यह होगा कि जिन स्कूलों में स्टूडेंट की संख्या एक निश्चित संख्या से अधिक नहीं है, वहां कई कक्षाओं के लिए केवल एक ही शिक्षक होगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जीआर छात्र-शिक्षक अनुपात को मापने के लिए कक्षा को एक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक सेक्शन, यानी प्राइमरी, अपर प्राइमरी और सेकेंडरी को छात्र-शिक्षक अनुपात को मापने के लिए एक इकाई के रूप में मानता है।
याचिकाकर्ता ने कहा,
"इसका आगे का परिणाम यह होगा कि कम स्टूडेंट्स वाले कई स्कूल/पड़ोस के स्कूल बंद हो जाएंगे, जिससे RTE Act 2009 का उद्देश्य विफल हो जाएगा। यह जीआर, टीचिंग पोस्ट को मंज़ूरी देते समय RTE Act, 2009 सहित विभिन्न राज्य और केंद्र कानूनों में स्कूल को मान्यता देने के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, दूरी और अन्य मानदंडों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करता है।"
यह स्पेशल लीव पिटीशन बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच के 1 दिसंबर, 2025 के आदेश के खिलाफ दायर की गई। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि कोर्ट की कोऑर्डिनेट बेंच पहले ही जीआर की वैधता पर फैसला कर चुकी है और उसे खारिज कर चुकी है।
कोर्ट ने इस SLP को 2016 के एक लंबित मामले के साथ टैग किया, जिसमें RTE Act की अनुसूची की व्याख्या और छात्र-शिक्षक अनुपात पर सवाल उठाया गया।
Case Details: SINDHUDUURG ZILLA SHIKSHAN SANSTHA CHALAK MANDAL, PANDUR (REGISTERED) VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA and others|SLP (C) No. 2479/2026