सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो एडिट कर सोशल मीडिया पर डालने पर लगाई अंतरिम रोक

Update: 2026-07-24 09:19 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा कि किसी भी न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को संबंधित अदालत की पूर्व अनुमति के बिना एक्सट्रैक्ट (क्लिप निकालना), एडिट, मॉडिफाई, पोस्ट, री-पोस्ट, अपलोड या मोनेटाइज नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश अदालती कार्यवाही की समाचार रिपोर्टिंग पर लागू नहीं होगा।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ ने यह आदेश पत्रकार हर्षिता ग्रोवर की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिका में अदालत की कार्यवाही के एडिटेड क्लिप सोशल मीडिया पर प्रसारित और मोनेटाइज किए जाने पर रोक लगाने के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई है।

कोर्ट ने सभी हाईकोर्टों, केंद्र सरकार तथा Meta और X सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी किया। हाईकोर्टों से लाइव-स्ट्रीमिंग गाइडलाइंस के क्रियान्वयन और उसके प्रभाव पर रिपोर्ट भी मांगी गई है।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि उन्हें लाइव-स्ट्रीमिंग से आपत्ति नहीं है, लेकिन चुनिंदा क्लिप्स वायरल कर न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। जस्टिस जॉयमल्या बागची ने कहा कि डिजिटल स्पेस में डेटा का नियमन बड़ी चुनौती है और अदालतें "24 घंटे का मनोरंजन चैनल" नहीं बन सकतीं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि AI की मदद से अदालत के वीडियो में जजों और वकीलों की आवाज़ तक बदली जा सकती है। वहीं, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत की कार्यवाही और उनकी टिप्पणियों को भी कई बार तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है।

याचिका में कहा गया है कि अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है, न कि उसे एडिट कर भ्रामक तरीके से सोशल मीडिया पर प्रसारित कर व्यावसायिक लाभ कमाना।

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