सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के बोबाज़ार ब्लास्ट केस में TADA दोषी की समय से पहले रिहाई पर रोक लगाई
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें 1993 के कोलकाता (बोबाज़ार) ब्लास्ट केस में उम्रकैद की सज़ा काट रहे मोहम्मद राशिद खान को समय से पहले रिहा करने का निर्देश दिया गया।
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने यह अंतरिम आदेश तब दिया, जब उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें TADA दोषी की रिहाई के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई।
सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने हाईकोर्ट के उस फ़ैसले पर सवाल उठाया, जिसमें सुधारवादी नज़रिए (reformative theory) के आधार पर राहत दी गई, जबकि उस बम धमाके में 70 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए।
राशिद खान की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एमआर शमशाद ने कहा कि उन्होंने जेल में 33 साल से ज़्यादा समय बिताया और बताया कि सह-आरोपी पन्नालाल जायसवाल को मार्च 2014 में सज़ा में छूट (remission) दी गई। हालांकि, बेंच ने कहा कि उनकी भूमिकाएं अलग-अलग थीं और टिप्पणी की कि राशिद खान "मास्टरमाइंड" था।
जब शमशाद ने कहा कि जेल में कैदी का व्यवहार अच्छा रहा है तो बेंच ने बताया कि उसे एक ऐसे काम के लिए सज़ा सुनाई गई, जो "लगभग आतंकवादी कृत्य" जैसा था।
दोषी की सेहत का ज़िक्र करते हुए सीनियर वकील ने बेंच से कहा,
"उसे कई बीमारियां हैं... एक आँख काम नहीं कर रही है। वह मानसिक रूप से अक्षम नहीं है, लेकिन उसकी हालत खराब है।"
बेंच ने यह भी कहा कि अगर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई तो राज्य की अपील बेअसर हो जाएगी।
राज्य ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने राज्य के 'सज़ा समीक्षा बोर्ड' (Sentence Review Board) की रिहाई के ख़िलाफ़ सिफ़ारिश के बावजूद राहत दी, क्योंकि उसे 'आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम' (TADA) के तहत दोषी ठहराया गया था।
5 जून को दिल्ली हाईकोर्ट ने राशिद खान की याचिका को मंज़ूरी दी थी, जिसने जेल में 33 साल से ज़्यादा समय बिताया था। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की लंबी जेल की अवधि, जेल में व्यवहार और समय से पहले रिहाई के पीछे की सुधारवादी सोच को ध्यान में रखा था।
खान की रिहाई का आदेश देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“यह माना गया कि सज़ा का मुख्य मकसद सुधार होना चाहिए और जेल में रहने के दौरान, दोषी कैदी को एक अच्छा इंसान बनाने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।”
1993 का बोबाज़ार धमाका 16 मार्च, 1993 की रात को कोलकाता में हुआ, जिसमें 69 लोगों की मौत हो गई और कई रिहायशी इमारतें तबाह हो गईं। स्थानीय डॉन राशिद खान द्वारा जमा किए गए भारी मात्रा में विस्फोटक के कारण हुई यह भयानक घटना मुंबई सीरियल धमाकों के कुछ ही दिनों बाद हुई।
Case : State of West Bengal v. Md. Rashid Khan | SLP(Crl) No. 11581/2026