'ठाणे की 193 एकड़ ज़मीन 'प्राइवेट फॉरेस्ट' के तौर पर अधिग्रहण से मुक्त': सुप्रीम कोर्ट ने लगाई बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक

Update: 2026-04-29 03:58 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाई। इस फ़ैसले में ठाणे के मानपाड़ा में लगभग 193 एकड़ ज़मीन को 'निजी जंगल' के तौर पर अधिग्रहण से मुक्त करने के फ़ैसले को सही ठहराया गया था। साथ ही ज़मीन मालिक के विकास के अधिकारों (Development Rights) के दावे के लिए रास्ता साफ़ किया गया था।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने ठाणे नगर निगम द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर नोटिस जारी किया। बेंच ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट के फ़ैसले का अमल अगली सुनवाई तक, जो 20 जुलाई 2026 को होनी है, रुका रहेगा।

कोर्ट ने कहा,

"नोटिस जारी किया जाए, जिसका जवाब 20.07.2026 तक देना है... विवादित फ़ैसले का अमल अगली सुनवाई तक रुका रहेगा।"

हाईकोर्ट का फ़ैसला

बॉम्बेहाई कोर्ट ने दो जुड़ी हुई रिट याचिकाओं पर एक साथ फ़ैसला सुनाया था। पहली याचिका महाराष्ट्र सरकार ने दायर की थी। इसमें महाराष्ट्र राजस्व ट्रिब्यूनल के 30 जून 2017 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें 193 एकड़ वन भूमि को अधिग्रहण से मुक्त किया गया। दूसरी याचिका ज़मीन मालिक कंपनी डी. दह्याभाई एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड ने दायर की थी। इसमें ठाणे नगर निगम को हस्तांतरित की गई ज़मीन के बदले 'हस्तांतरणीय विकास अधिकार' (TDR) दिए जाने की मांग की गई थी।

सरकार का पक्ष यह था कि लगभग 193 एकड़ ज़मीन 'महाराष्ट्र निजी वन (अधिग्रहण) अधिनियम, 1975' के तहत 'निजी जंगल' की श्रेणी में आती है। इसलिए यह ज़मीन सरकार के अधिकार में आ चुकी है। सरकार ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने इस ज़मीन को अधिग्रहण से मुक्त करके ग़लती की और उसने अपनी जांच के दायरे से बाहर जाकर फ़ैसला सुनाया।

सरकार ने बताया कि इस ज़मीन में से लगभग 168 एकड़ ज़मीन पहले से ही उसके कब्ज़े में है। यह संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर वन भूमि के तौर पर मौजूद है। सरकार ने यह भी दलील दी कि अगर इस ज़मीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया जाता है तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि यह ज़मीन राष्ट्रीय उद्यान/वन विभाग के नियंत्रण से बाहर चली जाएगी।

हाईकोर्ट ने सरकार की इस चुनौती को ख़ारिज किया और ट्रिब्यूनल का फ़ैसला सही ठहराया।

हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि सरकार इस बात को साबित करने में नाकाम रही है कि उसने ज़मीन मालिक को नोटिस देने के लिए क़ानून में तय की गई प्रक्रिया का सही ढंग से पालन किया है। ज़मीन को 'निजी जंगल' की श्रेणी में लाने के लिए इस प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य था। कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें राजस्व प्रविष्टियाँ और अनुमतियाँ शामिल हैं, यह दर्शाती है कि ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा निर्धारित तारीख से पहले ही गैर-वन उपयोग (non-forest use) में था, जैसे कि खेती, पत्थर की खुदाई और अन्य गतिविधियाँ।

कोर्ट ने राज्य के इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि ट्रिब्यूनल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया या कानून का गलत इस्तेमाल किया, और ट्रिब्यूनल के आदेश को सही ठहराया।

इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने 1975 के अधिनियम के तहत अधिग्रहण से लगभग 193 एकड़, 7 गुंठा और 4 आना ज़मीन को मुक्त करने के फैसले को प्रभावी रूप से बरकरार रखा।

चूँकि राज्य की रिट याचिका के परिणाम का कंपनी के दावे पर सीधा असर पड़ रहा था, इसलिए हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि पहली याचिका में लिया गया फैसला ही दूसरी याचिका के भविष्य का निर्धारण करेगा। राज्य की चुनौती असफल हो जाने के कारण ज़मीन के मालिक को TDR देने से इनकार करने का कोई आधार नहीं बचा। इसलिए विकास अधिकारों (Development Rights) के दावे पर तदनुसार विचार किया जाना आवश्यक है।

हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल लगभग 193 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण से मुक्त होने की प्रक्रिया को, साथ ही उससे जुड़े विकास अधिकारों के दावे को भी रोक दिया।

Case Title – Thane Municipal Corporation v. D. Dahyabhai and Co. Pvt Ltd. & Ors.

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