SIR की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग (ECI) द्वारा विभिन्न राज्यों में कराए गए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
अदालत यह जांच कर रही है कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अंतर्गत, वर्तमान स्वरूप में SIR कराने की शक्ति प्राप्त है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने नवंबर 2025 से चली आ रही विस्तृत सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया।
SIR क्या है
SIR एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची का घर-घर जाकर सत्यापन किया जाता है। इसमें बूथ लेवल ऑफिसर (BLOs) मतदाताओं से गणना प्रपत्र (enumeration forms) भरवाते हैं और प्रविष्टियों का गहन सत्यापन करते हैं।
SIR अधिसूचना के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम 2002/2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें उस व्यक्ति से वंशानुगत संबंध दिखाना होता है, जिसका नाम उस समय की सूची में दर्ज था। पहचान सत्यापन के लिए चुनाव आयोग ने 11 दस्तावेज़ निर्धारित किए थे, जिनमें बाद में आधार कार्ड भी जोड़ा गया।
याचिकाओं की पृष्ठभूमि
अधिकांश याचिकाएँ बिहार में SIR लागू किए जाने के बाद दायर की गई थीं। बाद में चुनाव आयोग ने SIR को अंडमान-निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक विस्तारित किया।
इस प्रक्रिया को चुनौती देने वालों में ADR, PUCL, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, के.सी. वेणुगोपाल, सुप्रिया सुले सहित कई संगठन और नेता शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि SIR एक NRC-जैसी अप्रत्यक्ष प्रक्रिया है, जिससे चुनाव आयोग को नागरिकता सत्यापन की भूमिका मिल जाती है, जबकि नागरिकता निर्धारण का अधिकार केंद्र सरकार और विदेशी न्यायाधिकरणों को है।
उन्होंने कहा कि SIR के तहत मतदाताओं पर अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डाला जा रहा है, जो RP Act की धारा 16 के विपरीत है।
इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि गणना प्रपत्रों का कोई स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं है, धारा 21(3) का गलत विस्तार किया गया है और पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी है।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने कहा कि SIR के तहत किया गया सत्यापन केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए है, न कि नागरिकता तय करने या निर्वासन के लिए। आयोग ने इसे 'लिबरल और सॉफ्ट-टच' प्रक्रिया बताया और कहा कि इसमें कोई कठोर जांच नहीं की जाती।
ECI ने यह भी कहा कि संविधान नागरिक-केंद्रित है और मतदाता सूची में विदेशियों को शामिल न होने देना उसका संवैधानिक दायित्व है।
आगे की राह
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह निर्णय देशभर में मतदाता सूची पुनरीक्षण की भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।