लंबित अपील के कारण सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी की सजा निलंबित की, जमानत दी
सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण परिस्थिति में हत्या के एक दोषी की सजा निलंबित कर दी, यह देखते हुए कि उसकी 2018 की आपराधिक अपील अभी तकमध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित है और निकट भविष्य में उसकी सुनवाई की संभावना नहीं है।
जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट ने अपनी पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस सजा को चुनौती देते हुए उसने 2018 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की, जो अब तक लंबित है। इस दौरान वह लगभग 8 वर्षों से जेल में है।
अपील लंबित रहने के दौरान याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 389(1) के तहत सजा निलंबन और जमानत की मांग की थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह ध्यान में रखा कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय फिलहाल वर्ष 2013 और 2014 की आपराधिक अपीलों की सुनवाई कर रहा है, जबकि याचिकाकर्ता की अपील 2018 की है। अदालत ने कहा कि जब तक उसकी अपील सुनवाई के लिए आएगी, तब तक उसे 3-4 साल और जेल में रहना पड़ सकता है।
अदालत ने कहा, “हमारे समक्ष यह तथ्य रखा गया है कि हाईकोर्ट वर्तमान में 2013 और 2014 की अपीलें सुन रहा है। याचिकाकर्ता की अपील 2018 की है, इसलिए उसके अंतिम निस्तारण में काफी समय लग सकता है। ऐसे में हम अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए याचिकाकर्ता को राहत देने के लिए प्रवृत्त हैं।”
अदालत ने आदेश दिया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को फिलहाल निलंबित किया जाता है और याचिकाकर्ता को उसकी अपील के अंतिम निपटारे तक जमानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते वह ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करे।
हालांकि, अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि गंभीर अपराधों में केवल देरी और लंबे समय तक कारावास ही सजा निलंबन का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। इस संदर्भ में जस्टिस सी. टी. रविकुमार की पीठ द्वारा दिए गए फैसले Shivani Tyagi Versus State of U.P. & Anr. का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि हत्या जैसे जघन्य अपराधों में केवल देरी के आधार पर सजा निलंबन उचित नहीं माना जा सकता।