वकीलों के विज्ञापन और क्लाइंट बनाने के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को रेगुलेट करने की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने BCI से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को PIL पर नोटिस जारी किया। इस PIL में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश देने की मांग की गई कि वे उन वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करें, जो कथित तौर पर डिजिटल तरीके से क्लाइंट बनाने (digital solicitation), सोशल मीडिया पर विज्ञापन, इन्फ्लुएंसर के साथ मिलकर काम करने और प्रमोशनल कंटेंट बनाने जैसे काम कर रहे हैं। ये काम 'एडवोकेट्स एक्ट, 1961' और 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स' का उल्लंघन हैं।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने नोटिस जारी किया, जिसका जवाब 15 सितंबर तक देना है।
याचिका में कहा गया,
"याचिकाकर्ता इस माननीय न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं ताकि डिजिटल तरीके से क्लाइंट बनाने, वकालत के काम के कमर्शियलाइज़ेशन (व्यावसायीकरण) और बार के कुछ सदस्यों द्वारा अदालती परिसर के खुलेआम गलत इस्तेमाल को रोका जा सके। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर की जाने वाली ये हरकतें 'एडवोकेट्स एक्ट, 1961' और 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स' को व्यवस्थित रूप से कमजोर करती हैं, जिससे न्याय व्यवस्था की गरिमा और अखंडता को खतरा पैदा होता है।"
याचिका में कहा गया कि कानूनी पेशे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए डिजिटल तरीके से क्लाइंट बनाने और कमर्शियलाइज़ेशन में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसमें आरोप लगाया गया कि वकील क्लाइंट को आकर्षित करने के लिए इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रमोशनल रील, पैसे कमाने वाले कानूनी कंटेंट, पेड कोलैबोरेशन और अन्य तरह के डिजिटल प्रचार कर रहे हैं, जिससे पेशे की गरिमा कम हो रही है।
याचिका के अनुसार, ऐसे कंटेंट का एक बड़ा हिस्सा अदालत परिसर के अंदर रिकॉर्ड किया जाता है, जिसमें वकील पूरी अदालती पोशाक में होते हैं। याचिका में आरोप लगाया गया कि इन वीडियो में अक्सर संपर्क विवरण, विशेषज्ञता के दावे, क्लाइंट के अनुभव (टेस्टिमोनियल), आपराधिक कार्यवाही का चित्रण और संभावित मुकदमों में शामिल होने वाले लोगों को आकर्षित करने के इरादे से सनसनीखेज कानूनी कमेंट्री होती है।
इसमें तर्क दिया गया कि ऐसा व्यवहार अप्रत्यक्ष रूप से क्लाइंट बनाने (solicitation) के बराबर है, जो 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स' के नियम 36 के तहत प्रतिबंधित है। साथ ही डिजिटल कंटेंट के लिए वकीलों के रोब (पोशाक) और अदालत परिसर का इस्तेमाल पेशेवर पोशाक और आचरण से जुड़े नियमों का उल्लंघन है।
याचिका में कहा गया कि ऐसे कंटेंट को कानूनी जागरूकता, शैक्षिक वीडियो या 'अपने अधिकारों को जानें' अभियान के तौर पर बताने से विज्ञापन पर लगी रोक को खत्म नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब इसका मुख्य मकसद खुद का प्रचार करना, क्लाइंट बनाना या कमर्शियल विजिबिलिटी बढ़ाना हो। इसमें आगे यह भी कहा गया कि अदालती पोशाक न्यायिक कार्यवाही की गरिमा का प्रतीक है और इसे ब्रांडिंग या कमर्शियल प्रचार के साधन में नहीं बदला जा सकता।
याचिका में कहा गया कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता पर बढ़ती निर्भरता ने वकीलों को पेशेवर काबिलियत के बजाय डिजिटल मौजूदगी के लिए होड़ करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे पेशेवर मानकों में गिरावट आई। याचिका में यह तर्क दिया गया कि कानूनी सेवाओं को अब ऐसी चीज़ों (कमोडिटी) के तौर पर पेश किया जा रहा है जिनकी मार्केटिंग सोशल मीडिया के ज़रिए की जा सकती है।
याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने 17 मार्च, 2025 को एक प्रेस रिलीज़ जारी करके वकीलों को इन्फ्लुएंसर और मशहूर हस्तियों के ज़रिए प्रचार गतिविधियों के खिलाफ़ चेतावनी दी थी और कहा था कि ऐसा करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव का भी ज़िक्र है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट परिसर के भीतर वीडियो बनाने और रील्स बनाने पर रोक लगाई गई। साथ ही मद्रास हाई कोर्ट के 3 जुलाई, 2024 के उस फ़ैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें वकीलों की रैंकिंग, डिजिटल तरीके से क्लाइंट जुटाने (डिजिटल सॉलिसिटेशन) और लीड-जेनरेशन के तरीकों को गैर-कानूनी माना गया।
याचिका में AIIMS के उस सर्कुलर का भी आधार लिया गया, जिसमें अस्पताल परिसर के भीतर रील्स और सोशल मीडिया कंटेंट बनाने पर रोक लगाई गई। इसमें तर्क दिया गया कि संवैधानिक अदालतों की पवित्रता और गरिमा बनाए रखने के लिए उन्हें और भी ज़्यादा सुरक्षा की ज़रूरत है।
इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने 2 जुलाई, 2026 को CJI और BCI के चेयरमैन को एक अर्ज़ी दी थी। इसमें तुरंत दखल देने, देश भर के लिए डिजिटल एथिक्स गाइडलाइंस बनाने और अनैतिक डिजिटल तरीके से क्लाइंट बनाने (डिजिटल सॉलिसिटेशन) के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस नियम-कानून नहीं बनाया गया।
याचिका में BCI को 'एडवोकेट्स एक्ट, 1961' और 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स' को सख्ती से लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई। इसमें नियम 36 भी शामिल है, जो क्लाइंट बनाने और विज्ञापन करने पर रोक लगाता है, साथ ही पेशेवर पहनावे से जुड़े नियम भी शामिल हैं।
इसमें 'एडवोकेट्स एक्ट' की धारा 35 के तहत उन वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की भी मांग की गई, जो सोशल मीडिया, प्रमोशनल रील्स, इन्फ्लुएंसर के साथ मिलकर काम करने, पैसे कमाने वाले कानूनी कंटेंट और विज्ञापन के अन्य प्रतिबंधित तरीकों से क्लाइंट बनाने का काम करते हैं।
इसके अलावा, इसमें यह घोषित करने की मांग की गई कि ऐसा प्रमोशनल डिजिटल कंटेंट पेशेवर कदाचार (प्रोफेशनल मिसकंडक्ट) माना जाएगा और सोशल मीडिया पर प्रमोशन के लिए वकीलों के रोब और बैंड का इस्तेमाल करना गलत है।
याचिका में कोर्ट परिसर के अंदर प्रमोशनल डिजिटल कंटेंट बनाने पर देश भर में रोक लगाने, BCI को 'एडवोकेट्स एक्ट' की धारा 49 के तहत वकीलों के लिए व्यापक डिजिटल एथिक्स गाइडलाइंस और डिजिटल पेशेवर आचरण संहिता (कोड ऑफ डिजिटल प्रोफेशनल कंडक्ट) बनाने का निर्देश देने और कानूनी पेशे में डिजिटल एथिक्स पर एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति बनाने की भी मांग की गई है, ताकि एक मॉडल कोड तैयार किया जा सके।
Case Title – Anil Pandey and Anr. v. Bar Council of India