सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फ़ैसला सुरक्षित रखा, जिसमें कहा गया था कि लॉ स्टूडेंट्स को सिर्फ़ अटेंडेंस कम होने की वजह से परीक्षा में बैठने या अपनी पढ़ाई जारी रखने से नहीं रोका जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) और नरसी मोनजी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ (NMIMS) की याचिकाओं पर फ़ैसला सुरक्षित रखा। इन याचिकाओं में हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें BCI को तीन-साल और पाँच-साल के LL.B. कोर्स के लिए ज़रूरी अटेंडेंस की शर्तों पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया गया।

हाईकोर्ट का फ़ैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला 2016 में एमिटी लॉ स्कूल, दिल्ली के एक स्टूडेंट की आत्महत्या के मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए कार्यवाही के दौरान सुनाया।

हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनी शिक्षा में अटेंडेंस की शर्तों को इतनी सख्ती से लागू नहीं किया जा सकता कि उससे मानसिक तनाव हो या आत्महत्या जैसे गंभीर नतीजे सामने आएं।

अदालत ने कहा कि भारत में किसी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज, यूनिवर्सिटी या संस्थान में दाखिला लेने वाले किसी भी स्टूडेंट को कम अटेंडेंस के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता और न ही उनकी आगे की पढ़ाई या करियर में आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। साथ ही यह भी कहा गया कि संस्थान BCI द्वारा तय न्यूनतम प्रतिशत से ज़्यादा अटेंडेंस के नियम नहीं बना सकते।

हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनी शिक्षा को सिर्फ़ क्लासरूम में अटेंडेंस तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्टूडेंट्स को मूट कोर्ट, सेमिनार, संसद की बहस, कोर्ट की सुनवाई, कानूनी सहायता क्लीनिक और अन्य गतिविधियों के ज़रिए प्रैक्टिकल अनुभव की भी ज़रूरत होती है। अदालत ने कहा कि अटेंडेंस के नियमों में काफ़ी लचीलापन ज़रूरी है ताकि स्टूडेंट्स ऐसी गतिविधियों में हिस्सा ले सकें और "बहुआयामी शिक्षा और प्रशिक्षण" हासिल कर सकें।

हाईकोर्ट ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी, 2020 और UGC फ्रेमवर्क का भी ज़िक्र किया और कहा कि शिक्षा का नज़रिया अब लचीलेपन, बहु-विषयक शिक्षा और ऑनलाइन शिक्षा के ज़्यादा इस्तेमाल की ओर बढ़ रहा है।

हाईकोर्ट ने BCI को निर्देश दिया कि वह स्टूडेंट्स, स्टूडेंट संगठनों, माता-पिता और शिक्षकों जैसे स्टेकहोल्डर्स से बातचीत करने के बाद तीन-साल और पाँच-साल के LL.B. कोर्स के लिए ज़रूरी अटेंडेंस के नियमों का फिर से मूल्यांकन करे। इसने BCI को निर्देश दिया कि वह मूट कोर्ट, सेमिनार, संसद की बहस और कोर्ट की सुनवाई में शामिल होने जैसी गतिविधियों के लिए क्रेडिट देने पर विचार करे।

इस प्रक्रिया के पूरा होने तक हाईकोर्ट ने एक अंतरिम व्यवस्था तय की। लॉ कॉलेजों को निर्देश दिया गया कि वे छात्रों को उनकी अटेंडेंस के बारे में नियमित रूप से सूचित करें, कमी होने पर माता-पिता या अभिभावकों को बताएं, अतिरिक्त फिजिकल या ऑनलाइन क्लास लें और अटेंडेंस की कमी को पूरा करने के लिए असाइनमेंट और लीगल एड क्लीनिक में प्रैक्टिकल काम का इस्तेमाल करें।

इसने आगे कहा कि अगर कोई छात्र सेमेस्टर के आखिर में तय अटेंडेंस की ज़रूरत से कम अटेंडेंस रखता है तो भी वह परीक्षा दे सकता है। संस्थान छात्र के फाइनल ग्रेड को ज़्यादा-से-ज़्यादा 5% तक कम कर सकता है (जहाँ मार्क्स दिए जाते हैं) या 0.33% तक (जहाँ CGPA सिस्टम का पालन किया जाता है)। सिर्फ़ अटेंडेंस की कमी के कारण छात्र को अगले सेमेस्टर में प्रमोट करने से नहीं रोका जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही

BCI के सर्कुलर (जिनमें अटेंडेंस की ज़रूरतों से जुड़े मामले भी शामिल थे) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई को दिल्ली हाई कोर्ट के नज़रिए पर असहमति जताई।

जस्टिस विक्रम नाथ ने BCI के वकील से पूछा कि क्या फैसले को चुनौती दी गई और कहा कि इससे "अराजकता" पैदा हुई है और यह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया। इसके बाद BCI ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती दी।

13 मई को हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ NMIMS की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिर से चिंता जताई। जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि इस फैसले का असर यह हो सकता है कि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के हॉस्टल सिर्फ़ "रहने और खाने की सुविधा" बनकर रह जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने शुरू में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया। हालांकि, 26 मई को उसने हाई कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 249 पर रोक लगाई, जिसमें संस्थानों को अटेंडेंस की कमी के कारण लॉ स्टूडेंट्स को रोकने से मना करने वाले निर्देश शामिल थे।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस मेहता ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को स्टूडेंट क्लास में न आने के लिए "फ़्री पास" की तरह मान सकते हैं, जबकि जस्टिस नाथ ने सवाल किया कि अगर छात्र क्लास में नहीं आते हैं तो टीचर क्या करें।

जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने उन छात्रों को एक बार के लिए राहत दी, जिनके एकेडमिक सेशन दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला आने के समय पहले से ही चल रहे थे। कोर्ट ने कहा कि जिन छात्रों का एकेडमिक सेशन 3 नवंबर, 2025 को (जब दिल्ली हाई कोर्ट का फ़ैसला आया था) चल रहा था, उन्हें सिर्फ़ अटेंडेंस कम होने की वजह से उस एकेडमिक सेशन की फ़ाइनल परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जा सकता।

जिन छात्रों की फ़ाइनल परीक्षा पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट गई, उन्हें भी उस सेशन के लिए सप्लीमेंट्री परीक्षा में बैठने की इजाज़त दी गई।

कोर्ट ने कहा कि यह राहत इसलिए दी जा रही थी, क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले ने अटेंडेंस के नियमों को कमज़ोर किया था और BCI ने इसके निर्देशों को "लगभग मान लिया" था। कोर्ट ने आगे कहा कि छात्रों ने इस भरोसे के साथ काम किया कि अटेंडेंस कम होने से उन्हें परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा।

कोर्ट ने साफ़ किया कि यह राहत एक बार का उपाय था और इससे दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों पर लगी रोक फिर से शुरू नहीं हुई।

इस मामले में अब फ़ैसला सुरक्षित रख लिया गया।

Case Title : SVKMS Narsee Monjee Institute of Management Studies v. Bar Council of India

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