"अधिकारी निर्धारिती के साथ लीग में हैं" : सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व संबंधी मामलों में अपील दायर करने में देरी पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई

Update: 2021-02-12 09:46 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राजस्व संबंधी मामलों में अदालत के समक्ष अपील दायर करने में घोर देरी बरतने के रुख के लिए भारत संघ को फटकार लगाई।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने केंद्रीय उत्पाद एवं बिक्री कर आयुक्त, सूरत द्वारा CESTAT आदेश के खिलाफ केंद्रीय उत्पाद एवं बिक्री कर अधिनियम,1944 की धारा 35 एल के तहत अपील की सुनवाई की, जो 536 दिन की देरी से दायर की गई थी।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि बार-बार, अदालत का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया गया है कि राजस्व मामलों में अपीलें घोर देरी के साथ दायर की जा रही हैं, साथ ही विलंब माफ करने के लिए आवेदन दाखिल किया जाता है। जब अदालत दलील देने से इंकार कर देती है तो अधिकारी यह कहते हुए अपनी कार्रवाई को सही ठहराते हैं कि हालांकि वे अदालत गए थे, सुप्रीम कोर्ट ने देरी माफ नहीं की और अपील खारिज कर दी।

पीठ ने एएसजी बलबीर सिंह की अगुवाई में अधिवक्ता एसए हसीब को यह कहते हुए दर्ज किया कि ये देरी आयुक्त कार्यालय के स्तर पर गलतफहमी के कारण हुई थी कि अपील गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष की जानी है। उच्च न्यायालय द्वारा अपील को खारिज किए जाने के बाद ही विभाग ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिससे देरी हुई।

पीठ ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील करने की कानूनी स्थिति संदेह का विषय नहीं हो सकती है और यह विभाग के लिए यह तर्क देने के लिए नहीं हो सकता कि उसे इस तरीके की जानकारी नहीं थी।

पीठ ने कहा,

"राजस्व विभाग में केंद्र सरकार को अपने अधिकारियों के इस तरह के आचरण के लिए एक जवाब तलाशना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन मामलों पर मुकदमेबाजी की जानी है, उन्हें आवश्यक प्रेषण द्वारा निपटा दिया जाए।" 

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सोमवार को इसके समक्ष पेश होने का अनुरोध किया है और केंद्र सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों के बारे में अदालत को अवगत कराना है कि इस तरह के बहाने लगाने वाले अधिकारियों के बजाय समयसीमा के पालन में मुकदमे चलाए जाएं।

 न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा,

"ऐसा लगता है कि भारत संघ केवल ' छाप' या मुहर प्राप्त करने के लिए ये करता है जिससे वो कह सके कि उसने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील की थी।"

न्यायमूर्ति शाह ने कहा,

"हमें सॉलिसिटर जनरल को बुलाना चाहिए। सभी मामलों में 400 से 500 दिन की देरी है।"

शुरू में यह माना गया था कि सीबीडीटी और सीबीआईसी में सचिव स्तर के अधिकारियों को सुधारात्मक उपायों के संबंध में भी बुलाया जाए।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की,

"अधिकारी निर्धारिती के साथ लीग में हैं। वे पहले गलत अदालत में अपील दायर करते हैं, फिर अपील में आपत्ति निहित होती है, इसे लंबित रखा जाता है और फिर इसे खारिज कर दिया जाता है। फिर वे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष देरी को माफ करने के लिए आवेदन के साथ आते हैं। जब अदालत माफी देने से इनकार कर देती है, तो वे सिर्फ यह कहते हैं कि "हम क्या कर सकते हैं?" हमने अदालत का दरवाजा खटखटाया और अपील दायर की लेकिन यह सर्वोच्च न्यायालय था जिसने सुनवाई नहीं की ! वो सुप्रीम कोर्ट पर बोझ डालते हैं।"

न्यायमूर्ति शाह ने कहा,

"कराधान के हर मामले में, यह सीमा शुल्क हो, आयकर हो, 300 से 400 दिन की देरी है।"

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने हसीब को कहा,

"भारत संघ उच्च न्यायालय में अपील दायर क्यों करेगा जब उसे पता है कि अपील को सर्वोच्च न्यायालय के सामने ही आना है।"

जब हसीब ने स्पष्टीकरण के माध्यम से दलील दी की, कि हो सकता है कि कमिश्नरी स्तर पर पर्याप्त कानूनी ज्ञान नहीं हो, तो बेंच को आश्चर्य हुआ।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका अभिप्राय यह था कि अधिकारी शायद यह याद रखते हैं कि उनका उपाय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है न कि उच्च न्यायालयों के समक्ष।

"इसमें जानबूझकर देरी है! सुप्रीम कोर्ट की मुहर पाने के लिए!" न्यायमूर्ति शाह ने टिप्पणी की।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की,

"हम इस मामले में नोटिस कर रहे हैं। इसमें करोड़ों लोग शामिल हैं। अधिकारियों का सिर्फ इतना कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने देरी माफ नहीं की। वे हमें घुमाने के लिए ले जा रहे हैं और यह अधिकारियों द्वारा प्रक्रिया का दुरुपयोग भी है !" ... जब एक निरीक्षक को उच्च स्तर पर पदोन्नत करने का सवाल होता है, तो अपील समय पर दायर की जाती है!" 

संयोग से, इसके अगले मामले में भी, जो केंद्रीय उत्पाद शुल्क और बिक्री कर आयुक्त, चंडीगढ़ द्वारा समान प्रावधानों के तहत एक अपील थी, में 808 दिनों की देरी हुई। इस मामले में, अपीलकर्ता के लिए एएसजी एन वेंकटरमन उपस्थित हुए।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने उल्लेख किया कि इस मामले में भी, मार्च 2019 में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की गई थी और इसे फरवरी 2020 में खारिज कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति शाह ने एएसजी को निर्देशित किया,

"आप जानते हैं कि आपका राजस्व विभाग कैसे काम करता है। आपने दोनों पक्षों पर काम किया है। मैंने भी दोनों पक्षों पर काम किया है।"

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि कमिश्नर यह कैसे नहीं जान सकते कि अपील सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है? भारत संघ यह विचार नहीं कर सकता कि अधिकारी अपील दायर करना नहीं जानते हैं।

न्यायमूर्ति शाह ने कहा,

"यदि आप आंकड़े देखेंगे, तो आप चौंक जाएंगे! 80 से 90% अपीलें इस तरह की घोर देरी से दायर की जाती हैं।"

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