नोएडा में मुस्लिम मौलवी पर हमले के मामले में FIR में हेट क्राइम धाराएँ न जोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस से सवाल किया
नोएडा के एक मुस्लिम मौलवी द्वारा दायर कथित हेट क्राइम से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि वर्ष 2021 में दर्ज एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 153B और 295A जैसे प्रावधान क्यों नहीं लगाए गए।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ काज़ीम अहमद शेरवानी की याचिका पर विचार कर रही थी, जिनका आरोप है कि उन पर उनकी मुस्लिम पहचान के कारण हमला किया गया। याचिकाकर्ता ने अदालत से निष्पक्ष जांच और शिकायत पर कार्रवाई से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कदम उठाने की मांग की है।
गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में हेट स्पीच और हेट क्राइम से जुड़ी याचिकाओं के एक समूह में फैसला सुरक्षित रखा था, लेकिन इस मामले को लंबित रखा गया था।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ेफा अहमदी ने कहा कि 2021 में हुआ हमला कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि ऐसे मामले बार-बार सामने आ रहे हैं और प्रशासन की ओर से उन्हें गंभीरता से लेने में अनिच्छा का एक पैटर्न दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि अदालत के निर्देश पर केस डायरी पेश किए जाने के बाद एफआईआर तो दर्ज की गई, लेकिन उसमें हेट क्राइम से जुड़े प्रावधान नहीं लगाए गए, बल्कि केवल शरीर के विरुद्ध अपराध, चोरी आदि धाराएँ शामिल की गईं। अहमदी ने तर्क दिया कि मामले के तथ्यों के आधार पर आईपीसी की धारा 153B और 295A स्पष्ट रूप से लागू होती हैं।
खंडपीठ की टिप्पणियाँ
शुरुआत में जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि हेट स्पीच और हेट क्राइम से जुड़े सामान्य मुद्दों पर अदालत पहले ही आदेश सुरक्षित रख चुकी है।
वहीं जस्टिस संदीप मेहता ने प्रारंभिक तौर पर कहा कि प्रथम दृष्टया ये अपराध बनते नहीं दिखते और सुझाव दिया कि ट्रायल कोर्ट को इस पर विचार करने दिया जाए।
जब अहमदी ने आईपीसी की धारा 298 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से शब्द या कृत्य) का हवाला देते हुए दाढ़ी खींचने और गाली-गलौज के आरोपों की ओर ध्यान दिलाया, तो न्यायमूर्ति मेहता ने सवाल किया,
“इससे धार्मिक भावना कैसे आहत हुई?”
जस्टिस मेहता ने यह भी कहा कि इन धाराओं के तहत अभियोजन तभी संभव है, जब धारा 196 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सरकार से स्वीकृति (sanction) मिले।
“बिना स्वीकृति के आप इन अपराधों में संज्ञान नहीं ले सकते,” उन्होंने कहा।
इस पर अहमदी ने जवाब दिया,
“लेकिन एफआईआर तो इन धाराओं में दर्ज होनी ही चाहिए। यह एक गंभीर मामला है।”
उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से पूछा कि आरोपों के आधार पर प्रथम दृष्टया अपराध बनते होने के बावजूद संबंधित धाराओं में एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई।
ASG ने कहा कि यह जांच अधिकारी की गलती थी और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई है।
इस पर जस्टिस मेहता ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“सिर्फ जांच शुरू करना इस सवाल का जवाब नहीं है कि सही धाराओं में मामला क्यों दर्ज नहीं किया गया। जब तक आप मामला दर्ज कर जांच नहीं करेंगे और स्वीकृति नहीं मांगेंगे, अभियोजन आगे कैसे बढ़ेगा?”
उन्होंने यह भी पूछा:
“आप स्वीकृति से इनकार कर सकते हैं, लेकिन क्या आप एफआईआर दर्ज करने से ही इनकार कर सकते हैं?”
एक विशिष्ट प्रश्न के उत्तर में ASG ने स्वीकार किया कि एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए थी। इस पर न्यायमूर्ति मेहता ने कहा, “तो अभी निर्देश दीजिए।”
हालांकि ASG ने कहा कि ऐसा आदेश मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जा सकता है। इस पर पीठ ने असहमति जताई।
जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा:
“आपके पास दो ही विकल्प हैं—या तो आप आवश्यक कदम उठाकर एफआईआर दर्ज कराएं, या फिर अदालत निर्देश जारी करे।”
अंततः, अदालत ने ASG को एक सप्ताह का समय दिया ताकि वह निर्देश प्राप्त कर सकें।
व्यापक संदर्भ पर बहस
सुनवाई के अंत में अहमदी ने फिर दोहराया कि ऐसे घटनाक्रम देशभर में हो रहे हैं और ये राष्ट्रीय एकता के लिए ठीक नहीं हैं।
हालांकि पीठ ने इस मामले को उस व्यापक संदर्भ में देखने से इनकार कर दिया।
जस्टिस मेहता ने कहा कि अदालत के समक्ष एक विशिष्ट घटना लाई गई है और व्यापक पैटर्न दिखाने के लिए कोई अनुभवजन्य आंकड़े (empirical evidence) नहीं हैं।
“हमने आपकी याचिका स्वीकार की है और सरकार से कार्रवाई की अपेक्षा करते हैं, लेकिन हम इस मामले को उस रंग में नहीं देख रहे,” न्यायालय ने स्पष्ट किया।