सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यात्रियों से वसूले गए विदेशी यात्रा टैक्स (FTT) को जमा करने में सिर्फ़ देरी होने को टैक्स न चुकाने के बराबर नहीं माना जा सकता, इसलिए इस पर फाइनेंस एक्ट, 1979 की धारा 38(3) के तहत तय जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानूनी समय-सीमा का उल्लंघन होने पर इस प्रावधान के तहत जुर्माना अपने आप नहीं लग जाता।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कस्टम अधिकारियों और वित्त मंत्रालय के तहत रिविजनल अथॉरिटी द्वारा सऊदी अरेबियन एयरलाइंस पर लगाए गए जुर्माने को रद्द किया। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ अपील मंज़ूरी की।

एयरलाइन (अपीलकर्ता) को फाइनेंस एक्ट, 1979 की धारा 35 के तहत अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर यात्रियों से FTT वसूलने का अधिकार था। उसने 1994 और 1997 के बीच छह बार सरकारी खजाने में टैक्स जमा करने में देरी की थी। इनमें से पांच मामलों में तय तारीखों से पहले ही डिमांड ड्राफ्ट खरीद लिए गए, लेकिन उन्हें समय पर जमा नहीं किया जा सका; एयरलाइन ने इसके लिए सुरक्षा प्रतिबंधों को वजह बताया। एक अन्य मामले में देरी की वजह संबंधित कर्मचारी का इमरजेंसी छुट्टी पर होना बताया गया।

अपीलकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए और शुरुआती तौर पर एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने फाइनेंस एक्ट की धारा 38(3) के तहत 12,000 रुपये का जुर्माना लगाया। अपील के बाद मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेजा गया, जिसके बाद जुर्माना बढ़ाकर 71,29,140 रुपये कर दिया गया। इस बढ़े हुए जुर्माने को अपीलेट अथॉरिटी, रिविजनल अथॉरिटी और बॉम्बे हाईकोर्ट ने सही ठहराया। उनका कहना था कि धारा 38(3) के तहत जुर्माना इरादे की परवाह किए बिना अपने आप लग जाता है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सवाल ये तय किए: क्या जानबूझकर चूक न होने पर भी धारा 38(3) के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है? क्या जुर्माना धारा 38(4) के तहत लगाया जाना चाहिए था? और क्या पेमेंट में अनजाने में हुई देरी को टैक्स न चुकाने के बराबर माना जा सकता है?

अपीलकर्ता की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट पीवी दिनेश ने तर्क दिया कि धारा 38(3) तभी लागू होती है, जब टैक्स का पेमेंट बिल्कुल न किया गया हो, और 'शो कॉज़ नोटिस' जारी होने से पहले देर से किए गए पेमेंट को पेमेंट न करने के बराबर नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि 1994 के संशोधन से लाए गए सेक्शन 38(4) में नियमों के उल्लंघन (जैसे देर से जमा करना) के लिए खास प्रावधान हैं। इसमें बहुत कम जुर्माना तय किया गया। इस बात को साबित करने के लिए 'यूएस टेक्नोलॉजीज इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स' मामले में कोर्ट के पहले के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें टैक्स न काटने और सोर्स पर काटे गए टैक्स को जमा करने में देरी के बीच इसी तरह का अंतर बताया गया।

केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट अरिजीत प्रसाद ने तर्क दिया कि धारा 38(3) एक सख्त दायित्व वाला प्रावधान है। 'पेमेंट न कर पाना' (fails to pay) वाक्यांश इतना व्यापक है कि इसमें देर से किया गया पेमेंट भी शामिल हो सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि कार्यवाही 'फॉरेन ट्रैवल टैक्स रूल्स, 1979' के नियम 12 के तहत होती है, जिसमें कोई समय-सीमा तय नहीं है, न कि नियम 7 के तहत, जो केवल बकाया टैक्स की वसूली पर लागू होता है।

उन्होंने 'मथुरा राम अग्रवाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य', 'आरएस जोशी बनाम अजीत मिल्स लिमिटेड' और 'गुजरात त्रावणकोर एजेंसी बनाम सीआईटी' जैसे मामलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि किसी वित्तीय कानून के उल्लंघन के लिए जुर्माने के मामले में 'मेन्स रिया' (अपराध करने के इरादे) को साबित करने की ज़रूरत नहीं होती।

इन तर्कों पर विचार करते हुए बेंच ने कहा कि धारा 38(3) और धारा 38(4), जिन्हें 1994 के संशोधन से जोड़ा गया, अलग-अलग क्षेत्रों में लागू होते हैं। कोर्ट ने तर्क दिया कि धारा 38(3) में 'फॉरेन ट्रैवल टैक्स का पेमेंट न कर पाना' वाक्यांश का मतलब पेमेंट न करना है, न कि देर से पेमेंट करना; कोर्ट ने कहा कि अगर कानून बनाने वालों का मकसद देर से किए गए पेमेंट को शामिल करना होता तो वे अलग शब्दों का इस्तेमाल करते। बेंच ने आगे कहा कि टैक्स जमा न करने के बजाय देर से जमा करने का मामला धारा 38(4) के तहत आता है, जिसे 1979 के नियमों के नियम 4 और 9 के साथ पढ़ा जाना चाहिए; इसमें जुर्माने की सीमा अपेक्षाकृत कम है।

बेंच ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कानूनी समय-सीमा का उल्लंघन होने पर जुर्माना अपने आप लग जाता है। हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड बनाम ओडिशा राज्य मामले में तीन जजों की बेंच के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि भले ही कम से कम जुर्माना तय हो, सक्षम अधिकारी के पास तकनीकी या मामूली उल्लंघन के मामलों में जुर्माना न लगाने का अधिकार होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि नियम 4 खुद कस्टम्स कलेक्टर को अधिकार देता है कि अगर कोई ठोस कारण बताया जाए तो टैक्स जमा करने में हुई देरी को माफ किया जा सके, और निचली अथॉरिटीज़ ने इस अधिकार पर ध्यान नहीं दिया।

फ़ैसले में कहा गया कि अपने-आप जुर्माना लगाना और 'मेन्स रिया' (अपराध करने का इरादा) को नज़रअंदाज़ करना दो अलग-अलग बातें हैं। जुर्माना लगाना ज़रूरी है या नहीं, यह कानूनी नियमों और फ़ैसला लेने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसमें नियम 12 के तहत सुरक्षा उपाय भी शामिल हैं, जिनके अनुसार जुर्माना लगाने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' देना और सुनवाई करना ज़रूरी है।

कोर्ट ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि एयरलाइन की अपनी अपील के बाद मामले को वापस भेजे जाने (रिमांड) पर जुर्माना 12,000 रुपये से बढ़ाकर 71 लाख रुपये से ज़्यादा कर दिया गया। बेंच ने 'रिफॉर्मेटियो इन पेइअस' (Reformatio in Peius) के सिद्धांत का हवाला दिया—जिसका मतलब है कि अपील करने वाले को कानून में उपलब्ध उपाय का इस्तेमाल करने के कारण पहले से ज़्यादा बुरी स्थिति में नहीं डाला जाना चाहिए।

बेंच ने 'ज्योति प्लास्टिक वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ' (जिसका फ़ैसला खुद जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने दिया था) में बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले और 'नागराजन बनाम तमिलनाडु राज्य' के हालिया फ़ैसले का आधार लिया। इन फ़ैसलों में कहा गया कि अपील करने वाले की स्थिति अपील दायर करने से पहले की स्थिति से ज़्यादा खराब नहीं हो सकती।

यह मानते हुए कि एयरलाइन पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जा सकता, कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले, रिविज़न ऑर्डर, अपील के फ़ैसले और नए सिरे से जारी मूल आदेश (de novo order-in-original) को रद्द कर दिया—जहाँ तक वे FTT जमा करने में देरी के छह मामलों के लिए जुर्माना लगाते थे। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जुर्माने के तौर पर पहले से चुकाई गई कोई भी रकम तीन महीने के भीतर 9% सालाना ब्याज के साथ वापस की जाए और एयरलाइन द्वारा दी गई बैंक गारंटी को भी खत्म करने का आदेश दिया।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए अपील मंज़ूर की गई।

Case: M/s Saudi Arabian Airlines v Union of India & Ors

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