फांसी के बजाय वैकल्पिक तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

Update: 2026-01-22 11:18 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा को फांसी के बजाय किसी अन्य तरीके से लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की।

यह याचिका फांसी की मौजूदा प्रक्रिया को समाप्त करने की मांग करती है, यह कहते हुए कि इससे दोषी को अत्यधिक और लंबा शारीरिक व मानसिक कष्ट झेलना पड़ता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता-इन-पर्सन एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा ने लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें विभिन्न देशों में अपनाए गए मौत की सज़ा के तरीकों का तुलनात्मक अध्ययन है।

सुप्रीम कोर्ट ने उनसे कहा कि वे इस रिपोर्ट और संबंधित फैसलों पर एक संक्षिप्त लिखित नोट रिकॉर्ड पर रखें।

प्रोजेक्ट 39ए की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने घातक इंजेक्शन (लीथल इंजेक्शन) के विकल्प पर विस्तृत अध्ययन किया है खासतौर पर अमेरिका के अनुभव के आधार पर।

उन्होंने कहा कि वहां इस प्रक्रिया में कई बार गंभीर खामियां सामने आई हैं और कई फांसी असफल भी हुई हैं।

इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने पूछा,

“तो आपका सुझाव क्या है?”

अरोड़ा ने जवाब दिया कि इस विषय पर एक विशेषज्ञ समिति बनाई जानी चाहिए, जो सभी संभावित विकल्पों पर गहराई से अध्ययन करे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि फांसी की प्रक्रिया में भी दर्द और पीड़ा होती है और मौत तुरंत नहीं होती।

जस्टिस संदीप मेहता ने फांसी की प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक प्रभाव की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि इसे देखने और अंजाम देने वालों, खासकर जल्लादों पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर विचार कर रही है और कुछ समितियों का गठन किया गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि आगे चलकर जरूरत महसूस हुई तो केंद्र सरकार दोबारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आ सकती है।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से तीन सप्ताह के भीतर अपने-अपने लिखित नोट और संक्षिप्त दलीलें दाखिल करने को कहा और मामला निर्णय के लिए सुरक्षित रख लिया।

पृष्ठभूमि

याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई, जिसमें मौत की सज़ा को गले में फंदा डालकर मृत्यु तक लटकाने का प्रावधान है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह तरीका क्रूर, अमानवीय और बर्बर है तथा संयुक्त राष्ट्र के उस सिद्धांत के भी खिलाफ है, जिसके अनुसार मौत की सज़ा दी जाए तो उसमें न्यूनतम पीड़ा होनी चाहिए।

याचिका में यह भी मांग की गई कि गरिमापूर्ण तरीके से मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया जाए।

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