अदाणी-LIC निवेश पर लेख से जुड़े FIR के खिलाफ रवि नायर ने सुप्रीम कोर्ट से वापस ली याचिका, आरोपपत्र के बाद फिर उठाएंगे सभी मुद्दे
पत्रकार रवि नायर ने अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड की शिकायत पर गुजरात में दर्ज जालसाजी के मामले को रद्द करने से गुजरात हाईकोर्ट के इनकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका बुधवार को वापस ली।
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उचित चरण पर उचित मंच के समक्ष अपनी सभी आपत्तियां उठाने की छूट देते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि आरोपपत्र दाखिल होने के बाद नायर मामले से जुड़े सभी कानूनी और तथ्यात्मक मुद्दे उठाएंगे।
उन्होंने कहा,
“जब आरोपपत्र दाखिल होगा, तब हम सभी बिंदु उठाएंगे। यही बेहतर होगा।”
पीठ ने आदेश में दर्ज किया कि सीनियर एडवोकेट ने अपने मुवक्किल के निर्देश पर याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए नायर को उचित समय पर उचित मंच के समक्ष अपनी शिकायतें उठाने की स्वतंत्रता दी।
मामला 24 अक्टूबर 2025 को वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित नायर के एक लेख से जुड़ा है। लेख में दावा किया गया कि भारतीय जीवन बीमा निगम ने केंद्र सरकार के प्रभाव में अदाणी समूह में 3.9 अरब डॉलर का निवेश किया। लेख में ऐसे दस्तावेजों का भी हवाला दिया गया था जिन्हें कथित तौर पर LIC या वित्तीय सेवा विभाग की ओर से जारी बताया गया।
लेख प्रकाशित होने के बाद LIC ने सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि लेख में बताए गए दस्तावेज उसके द्वारा जारी या प्राप्त नहीं किए गए।
LIC ने यह भी कहा था कि अदाणी ग्रुप में निवेश किसी बाहरी दबाव या प्रभाव में नहीं किया गया। वित्तीय सेवा विभाग की ओर से भी कहा गया कि उसके द्वारा ऐसे कोई दस्तावेज तैयार नहीं किए गए।
इसके बाद अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड ने मानहानि का आरोप लगाते हुए निजी शिकायत दर्ज कराई। बाद में मौजूदा FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS)की धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी धाराओं के तहत अपराध दर्ज किए गए।
नायर ने गुजरात हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि उन्हीं तथ्यों को लेकर मानहानि की निजी शिकायत पहले से लंबित है और FIR दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उनका तर्क था कि शिकायत पर कोई जांच का आदेश दिए बिना FIR दर्ज की गई, जिसका उद्देश्य उन्हें परेशान करना था। उन्होंने यह भी कहा था कि केवल LIC द्वारा दस्तावेजों से इनकार कर देने से वे दस्तावेज जाली नहीं हो जाते।
अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि कथित जालसाजी के पहलू की जांच जरूरी है और नायर जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड की ओर से यह भी कहा गया कि नायर ने पहले सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का तथ्य छिपाया था।
कंपनी ने तर्क दिया कि मानहानि के लिए सीधे FIR दर्ज नहीं की जा सकती थी, इसलिए निजी शिकायत की गई, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अन्य अपराधों के संबंध में FIR दर्ज नहीं हो सकती।
गुजरात हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार करते हुए कहा था कि समान तथ्यों पर मानहानि की निजी शिकायत लंबित होना अपने आप में FIR को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं बना देता।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि नायर के लेख में जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया उनके अस्तित्व से LIC और केंद्रीय वित्त मंत्रालय दोनों ने इनकार किया।
हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया कहा था कि इन दस्तावेजों का अस्तित्व संदिग्ध है और वे जाली प्रतीत होते हैं। हालांकि, दस्तावेज वास्तव में जाली हैं या नहीं, इसका पता जांच एजेंसी को लगाना है। इसी आधार पर अदालत ने माना कि दस्तावेजों की सच्चाई सामने लाने के लिए जांच आवश्यक है और FIR रद्द करने से इनकार किया।
अब सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लिए जाने के बाद नायर को आरोपपत्र दाखिल होने के बाद संबंधित अदालत के समक्ष अपने तर्क और आपत्तियां उठाने की स्वतंत्रता रहेगी।