सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (AAP) की गुजरात इकाई को अंतरिम राहत देते हुए मेटा को उसके फेसबुक और इंस्टाग्राम पेज बहाल करने का निर्देश दिया।

अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि आपत्तिजनक पोस्ट हटाने के बाद ही इन खातों को बहाल किया जाएगा।

जस्टिस पी. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने आप की ओर से दाखिल अंतरिम अर्जी मंजूर करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की।

यह अर्जी उस मुख्य मामले में दाखिल की गई थी जिसमें आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा यूजर्स को पर्याप्त जानकारी दिए बिना सामग्री और खातों को बंद करने या प्रतिबंधित करने के व्यापक मुद्दे को उठाया है। अंतरिम अर्जी में गुजरात इकाई के इंस्टाग्राम अकाउंट '@aapgujarat' और फेसबुक पेज को बहाल करने की मांग की गई।

पार्टी के अनुसार, बंद किए जाने से पहले इन दोनों पेजों पर कुल मिलाकर 10.39 लाख से अधिक लोग जुड़े हुए थे। पार्टी ने कहा कि सोशल मीडिया पेजों को बंद करने से राष्ट्रीय राजनीतिक दल का पूरा संचार माध्यम प्रभावित होता है, इसलिए मामले के अंतिम निपटारे तक अंतरिम राहत जरूरी है।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट शादान फरासत ने आप की ओर से पेश होकर अंतरिम राहत देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि केंद्र की ओर से एक बार फिर सुनवाई टालने का अनुरोध किया गया।

मामले की शुरुआत में इसे कुछ समय के लिए टाल दिया गया, क्योंकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता किसी अन्य अदालत में व्यस्त थे।

जब मामला दोबारा सुनवाई के लिए आया तो एक अधिवक्ता ने बुधवार तक सुनवाई स्थगित करने का जोरदार अनुरोध किया। हालांकि, पीठ ने इससे इनकार करते हुए अंतरिम अर्जी मंजूर कर ली।

जस्टिस नरसिम्हा ने सुनवाई टालने के अनुरोध पर कहा,

“हम इस मामले को कितनी बार स्थगित करेंगे?”

इसके बाद अदालत ने आदेश दिया,

“अंतरिम अर्जी इस शर्त के साथ मंजूर की जाती है कि आपत्तिजनक पोस्ट हटा दिए जाएं। दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करें।”

आप की गुजरात इकाई के सोशल मीडिया अकाउंट को अप्रैल 2026 में स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बंद किया गया। अकाउंट पर कार्रवाई को कथित तौर पर गुजराती फिल्मों के दृश्यों और अंशों को राजनीतिक प्रचार सामग्री में बिना अनुमति इस्तेमाल करने से जुड़े कॉपीराइट उल्लंघन से जोड़ा गया। उस समय AAP नेताओं ने कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आरोप लगाया कि मेटा ने भाजपा के कहने पर अकाउंट बंद किया।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में AAP ने अकाउंट को बंद करने और निलंबित करने के कानूनी आधार पर सवाल उठाया है। पार्टी ने यह घोषणा करने की मांग की कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) अधिकारियों को किसी सूचना को बंद करने का निर्देश देने का अधिकार नहीं देती।

धारा 79 मध्यस्थ मंचों को कुछ परिस्थितियों में कानूनी जिम्मेदारी से छूट देने से संबंधित है। इसकी उपधारा (3)(बी) के तहत किसी मध्यस्थ को उपलब्ध सुरक्षित छूट उस स्थिति में लागू नहीं होती, जब अदालत के आदेश या सरकार की अधिसूचना के जरिए उसे किसी गैरकानूनी सामग्री के बारे में वास्तविक जानकारी मिलती है और वह सामग्री को तुरंत हटाने या उसकी पहुंच रोकने में विफल रहता है।

आप ने इस प्रावधान के आधार पर सूचना को बंद करने से संबंधित जारी सभी परिणामी निर्देशों, नियमों और अधिसूचनाओं को भी अमान्य घोषित करने की मांग की।

याचिका में कानून लागू करने वाली एजेंसियों की ओर से मेटा को कथित तौर पर दिए गए उन निर्देशों को रद्द करने की मांग की गई, जिनके आधार पर गुजरात इकाई के फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट बंद या निलंबित किया गया। पार्टी ने इन निर्देशों से संबंधित रिकॉर्ड भी अदालत के समक्ष मंगाने की मांग की।

AAP ने कहा कि '@aapgujarat' इंस्टाग्राम खाते और फेसबुक पेज को बंद करने की कार्रवाई मनमानी, गैरकानूनी और असंवैधानिक है तथा संविधान के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करती है। पार्टी ने पंजीकृत राजनीतिक दलों के आधिकारिक सोशल मीडिया खातों को बंद या निलंबित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपाय तय करने की भी मांग की।

पार्टी ने अदालत से यह सुनिश्चित करने की मांग की कि किसी राजनीतिक दल के आधिकारिक सोशल मीडिया खाते के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करने से पहले उसे पूर्व सूचना दी जाए, सुनवाई का अवसर दिया जाए और लिखित कारण बताए जाएं। साथ ही कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19(2) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए में निर्धारित आधारों के अनुरूप ही हो।

धारा 69ए सरकार को कुछ निर्धारित परिस्थितियों में ऑनलाइन सूचना तक सार्वजनिक पहुंच रोकने की शक्ति देती है। इनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था तथा इन आधारों से जुड़े संज्ञेय अपराध के लिए उकसावे को रोकना शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट का सोमवार का आदेश फिलहाल अंतरिम राहत तक सीमित है। मामले के व्यापक कानूनी सवालों पर अदालत को आगे सुनवाई करनी है।

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