CAPF अवमानना मामला दूसरी बेंच को सौंपने से 'मास्टर ऑफ़ रोस्टर' की शक्तियों पर सवाल उठे हैं? दुष्यंत दवे
'मास्टर ऑफ़ रोस्टर' यानी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने फिर से ऐसा कदम उठाया है, जो उनकी तय शक्तियों से परे है और जिससे न्याय में बाधा पड़ने का संकेत मिलता है।
CJI ने कथित तौर पर 29 सितंबर को एक प्रशासनिक आदेश जारी किया, जिसमें जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की विशेष बेंच बनाई गई। इस बेंच को 30 सितंबर को CA 13106/2024 में अवमानना याचिका 37/2026 पर सुनवाई करनी है।
ऐसा करके CJI ने सीधे तौर पर जस्टिस भुइयां और जस्टिस चंदुरकर की बेंच द्वारा 29 सितंबर को ही पारित न्यायिक आदेश में दखल दिया। उस आदेश में जजों ने 'डेली कॉज़ लिस्ट' (रोज़ाना की सुनवाई सूची) में आइटम नंबर 32 के तौर पर लिस्टेड उसी मामले को हटाए जाने पर हैरानी जताई थी। उन्होंने 22 सितंबर के अपने पिछले आदेश का हवाला देते हुए निर्देश दिया था कि मामले को 30 सितंबर को उनके सामने लिस्ट किया जाए और रजिस्ट्री इस हटाने की वजह बताए।
यह मामला सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़ (CAPF) में 46 इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) अधिकारियों की डेप्युटेशन (प्रतिनियुक्ति) से जुड़ा है।
कई सवाल उठते हैं और उनका समाधान ज़रूरी है।
न्यायिक आदेश के अनुसार लिस्ट किए गए मामले को कैसे हटा दिया गया? क्या इसलिए हटाया गया, क्योंकि CJI ने ऐसा निर्देश दिया? अगर हां तो CJI से किसने संपर्क किया? क्या उन्होंने खुद से (suo motu) ऐसा किया? क्या पक्षों की बात सुनी गई या सिर्फ़ एक पक्ष मौजूद था? क्या शायद रजिस्ट्री ने खुद ऐसा किया? किसी भी स्थिति में मामले को हटाना पूरी तरह से गैर-कानूनी, अनावश्यक और बेहद अनुचित था। इस प्रक्रिया में साफ़ तौर पर न्याय के रास्ते में बाधा डाली गई।
सबसे पहले और सबसे ज़रूरी बात यह है कि 'मास्टर ऑफ़ रोस्टर' के तौर पर CJI को इस मामले की जाँच का आदेश देना चाहिए और यह सुनिश्चित करके स्थिति सुधारनी चाहिए कि मामला उसी बेंच के सामने लिस्ट हो।
शांति भूषण बनाम भारत के सुप्रीम कोर्ट मामले में, जिसमें 'मास्टर ऑफ़ रोस्टर' (केस बांटने वाले अधिकारी) की शक्तियों पर सवाल उठाए गए, जस्टिस सीकरी ने मास्टर की शक्तियों को सही ठहराते हुए कहा:
“साथ ही, 'चीफ़ जस्टिस' की शक्ति किसी खास बेंच के कामकाज को रेगुलेट करने तक नहीं होती, जब एक बार केस उस बेंच को सौंप दिए जाते हैं। अन्य जजों (Puisne Judges) से बनी बेंच बिना किसी दखल के - जिसमें चीफ़ जस्टिस का दखल भी शामिल है - अपना न्यायिक काम करती है, क्योंकि उसे कानून के मुताबिक काम करना होता है। इसलिए जब कोई खास मामला किसी खास बेंच को सौंपा जाता है तो उस केस पर उस बेंच का पूरा अधिकार हो जाता है।”
साफ़ है कि CJI ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए इस कानून का साफ़ और स्पष्ट उल्लंघन किया; यह कानून देश का कानून है और खुद कोर्ट पर भी लागू होता है।
जस्टिस भूषण ने एक अलग लेकिन सहमति वाला फ़ैसला लिखते हुए कानून की इस बात से असहमति नहीं जताई।
लेकिन उन्होंने कहा:
“इस तरह लोगों का भरोसा ही वह आधार है जिस पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और न्याय करने की क्षमता की इमारत टिकी है। किसी भी वजह से जनता की नज़र में न्यायपालिका की विश्वसनीयता कम होना, न्यायपालिका की आज़ादी के लिए सबसे बड़ा खतरा है।”
फली नरीमन का ज़िक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा:
“हमारे संविधान द्वारा बनाई गई संस्थाएं, जैसे सुप्रीम कोर्ट, उन लोगों से कहीं बड़ी हैं और हमेशा रहेंगी जो उस समय उनके प्रमुख होते हैं।”
अशोक पांडे बनाम भारत के सुप्रीम कोर्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से उम्मीद जताई थी:
“चीफ़ जस्टिस को अधिकार सौंपने का मुख्य मकसद यह पक्का करना है कि सुप्रीम कोर्ट उन संवैधानिक दायित्वों को पूरा कर सके, जो उसके अस्तित्व का आधार हैं और उसे निर्देशित करते हैं। संस्था के प्रमुख के तौर पर चीफ़ जस्टिस को काम सौंपने का मकसद सुप्रीम कोर्ट की उस स्थिति को सुरक्षित करना है, जो व्यक्तिगत आज़ादी की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र सुरक्षा कवच का काम करती है। अविश्वास की कोई धारणा नहीं हो सकती। पद की शपथ इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं करती।”
CJI कांत ने इन नेक उम्मीदों पर पानी फेर दिया है और उस भरोसे को तोड़ने, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को खत्म करने और कानून के उस शासन को ही नकारने जैसा गंभीर काम किया, जिसे बनाए रखने की उनसे उम्मीद की जाती है।
न्यायिक आदेशों का उल्लंघन करते हुए किसी मामले को तय बेंच से हटाकर एक स्पेशल बेंच बनाने का आदेश देना मनमाना और गलत नीयत वाला लगता है। हमें कभी पता नहीं चलेगा कि CJI ने ऐसा सख्त और गैर-कानूनी कदम क्यों उठाया, जिससे सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPF) - जैसे सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF), बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF), इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP), सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) - के लगभग 17,000 अधिकारियों के अधिकारों को नुकसान पहुँचा।
लेकिन एक बात साफ है। सरकार के कई आदेशों - खासकर डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल के आदेशों - और सुप्रीम कोर्ट के दो सीधे फैसलों (एक फरवरी 2019 का फैसला, जिसे डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने 26 मार्च 2019 के ऑफिस मेमोरेंडम में माना था; 4 जुलाई 2019 को केंद्रीय गृह मंत्रालय का आदेश; और मई 2025 का एक और फैसला) के बावजूद, केंद्र सरकार CAPF (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट, 2026 लेकर आई। इस कानून ने फैसलों के आधार को हटाए बिना ही उन्हें बेअसर कर दिया।
यह सब इसलिए किया गया ताकि इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) के अधिकारियों को डेप्युटेशन के ज़रिए डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस या स्पेशल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस और इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस जैसे ऊँचे प्रशासनिक पद क्रमशः 100%, 67% और 50% तक मिल सकें, जबकि वे इन सेवाओं का हिस्सा नहीं होते हैं।
इस वजह से उन हजारों अधिकारियों के प्रमोशन के रास्ते बंद हो गए, जो देश की बाहरी और अंदरूनी दुश्मनों से रक्षा करने के लिए इन सेवाओं में शामिल होते हैं। पिछले कुछ सालों में ड्यूटी के दौरान इनमें से सैकड़ों अधिकारियों की मौत हो चुकी है और हजारों गंभीर रूप से घायल हुए। IPS अधिकारियों के पास अपने-अपने राज्य कैडर में प्रमोशन के सैकड़ों मौके होते हैं, फिर भी वे बहादुर अधिकारियों को 15 से 20 साल तक प्रमोशन से वंचित रखना चाहते हैं। अक्सर, ये प्रमोशन शायद कभी मिलें ही नहीं।
हैरानी की बात है कि रेल मंत्रालय ने भी सुप्रीम कोर्ट के 2019 के उसी फैसले को माना और उसके मुताबिक काम किया, जिससे रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को फायदा हुआ था। तो फिर केंद्र सरकार भेदभाव क्यों करेगी और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवमानना का रास्ता क्यों अपनाएगी?
IPS अधिकारियों में ऐसी क्या खास बात है, जो इन अनुभवी, पक्के इरादे वाले और प्रेरित अधिकारियों में नहीं है? क्या शायद इसलिए कि सरकार को भरोसा है कि IPS अधिकारी चुनावों जैसे मौकों पर उसकी इच्छा के अनुसार काम करेंगे? यह बात हम कभी नहीं जान पाएंगे। लेकिन CAPF के इन बहादुर अधिकारियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है।
CJI को यह सब पता होना चाहिए था। हो सकता है कि उन्हें पता हो और इसीलिए उन्हें वैसा करने के लिए मनाया गया हो। लेकिन आइए उम्मीद करें और प्रार्थना करें कि CJI के लिए रास्ता सुधारने और सुप्रीम कोर्ट में लोगों का भरोसा बहाल करने में बहुत देर न हुई हो। उम्मीद है कि दूसरे सम्मानित जज भी आत्म-मंथन करके रास्ता सुधारेंगे, क्योंकि पिछले कुछ सालों से ऐसा गलत व्यवहार हो रहा है जिसके बारे में सभी जानते हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग इस पर चुप भी रहे हैं।
आखिर में बस यही कहा जा सकता है कि भगवान भारत के सुप्रीम कोर्ट की रक्षा करे।
लेखक- दुष्यंत दवे एक सीनियर वकील हैं, जिन्होंने 48 साल तक वकालत की है और वह तीन बार सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे हैं।