एक ही वैवाहिक घटना पर दूसरी शिकायत कानून का दुरुपयोग: कलकत्ता हाइकोर्ट ने 498A का मामला किया रद्द

Update: 2026-02-02 07:00 GMT

कलकत्ता हाइकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एक ही वैवाहिक घटना को लेकर समान आरोपों के आधार पर दूसरी आपराधिक कार्यवाही चलाना न केवल असंवैधानिक है बल्कि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग भी है।

कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और हत्या के प्रयास से जुड़े एक मामले में पति और उसके परिवारजनों के खिलाफ दर्ज दूसरी FIR रद्द की।

जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने कहा कि जब किसी घटना को लेकर पहले ही एक FIR दर्ज हो चुकी हो, तो उसी घटना के संबंध में दूसरी शिकायत अलग मंच पर दायर करना स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने माना कि ऐसी कार्यवाही न्याय के हित में नहीं है और इससे केवल उत्पीड़न को बढ़ावा मिलता है।

हाइकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि 18 मार्च, 2022 की कथित घटना को लेकर दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज की गई, जिनमें आरोप लगभग एक जैसे थे। दूसरी शिकायत में पहले से दर्ज FIR के अस्तित्व का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जिससे यह प्रतीत हुआ कि इस तथ्य को जानबूझकर छुपाया गया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि ससुराल पक्ष के सदस्यों के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे तथा किसी के खिलाफ कोई विशिष्ट भूमिका या ठोस कृत्य सामने नहीं आया।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि अभियोजन के रिकॉर्ड और केस डायरी में गंभीर आरोपों, जैसे मिट्टी का तेल डालकर जलाने की कोशिश, के समर्थन में कोई ठोस या स्वतंत्र सामग्री मौजूद नहीं थी।

इसके अलावा CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान में भी शिकायतकर्ता के कथनों में विरोधाभास पाए गए विशेष रूप से कथित जबरन गर्भपात को लेकर।

हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत आवेदन देने से पहले CrPC की धारा 154(1) और 154(3) में निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। ऐसे में दूसरी FIR के आधार पर शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही विधिसंगत नहीं मानी जा सकती।

इस मामले में जस्टिस दास ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य, इंदर मोहन गोस्वामी बनाम उत्तरांचल राज्य और गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में अक्सर पूरे परिवार को यांत्रिक तरीके से अभियुक्त बना दिया जाता है।

कोर्ट ने दोहराया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग अदालतों को सावधानीपूर्वक करना चाहिए ताकि कानून का दुरुपयोग रोका जा सके और न्याय के उद्देश्य की रक्षा हो सके।

मामले की पृष्ठभूमि

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि लंबे समय तक संबंध में रहने और मंदिर में विवाह के बाद उसे मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, मारपीट, बंधक बनाए जाने, दहेज की मांग और जिंदा जलाने की कोशिश का सामना करना पड़ा। पहले इस संबंध में सागर थाना में FIR दर्ज कराई गई। इसके बाद उसने रणाघाट कोर्ट में CrPC की धारा 156(3) के तहत दूसरी शिकायत दाखिल की, जिसके आधार पर धंताला थाना में आईपीसी की धारा 498A, 323, 307, 313, 406, 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज हुआ।

आरोपियों ने दूसरी कार्यवाही को दोहरावपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए हाइकोर्ट का रुख किया। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाइकोर्ट ने माना कि दूसरी आपराधिक कार्यवाही न केवल अस्थिर और सबूतों से रहित है, बल्कि इसे जारी रखना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा।

इसी आधार पर हाइकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित कार्यवाही रद्द की और केस डायरी संबंधित अदालत को लौटाने का निर्देश दिया।

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