सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (9 अक्टूबर) को NGO 'एनर्जी वॉचडॉग' की एक PIL (जनहित याचिका) पर नोटिस जारी किया। यह याचिका 15 राज्यों और जम्मू-कश्मीर के राज्य बिजली नियामक आयोगों में लंबे समय से खाली पड़े पदों और कानूनी रूप से योग्य सदस्यों की कमी के बारे में है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह नोटिस जारी किया।

याचिका में कहा गया कि लंबे समय से खाली पड़े पद संविधान के अनुच्छेद 21, बिजली अधिनियम, 2003 और 'स्टेट ऑफ़ गुजरात बनाम यूटिलिटी यूज़र्स वेलफेयर एसोसिएशन' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का उल्लंघन हैं।

याचिका में कहा गया,

"कानूनी रूप से गठित आयोग न बना पाना, अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उपभोक्ताओं के न्याय पाने के अधिकार पर चोट करता है। कानून के तहत ज़रूरी कानूनी विशेषज्ञ की अनुपस्थिति में, उपभोक्ता बिजली अधिनियम की धारा 142 के तहत वितरण लाइसेंसधारियों के खिलाफ शिकायतों का कानूनी समाधान नहीं पा सकते, भले ही ऐसी कार्यवाही के लिए ज़रूरी शर्तें पूरी हों। उपभोक्ताओं के इस उपाय तक पहुँच को उस संस्था के पदों को भरने में कार्यकारी (सरकार) की अनिश्चितकालीन निष्क्रियता पर निर्भर नहीं किया जा सकता, जिसे कानून लागू करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। तमिलनाडु में, सदस्यों की पूरी तरह से अनुपस्थिति न्यायिक और नियामक दोनों तरह के कामकाज को रोक देती है।"

याचिका में संबंधित राज्य सरकारों और अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई कि वे यह सुनिश्चित करें कि आयोगों का गठन बिजली अधिनियम की धारा 82, 84 और 85 और 2018 के फैसले के अनुसार हो। उस मामले में, कोर्ट ने कहा था कि राज्य बिजली नियामक आयोग का सदस्य कानून का जानकार और उपयुक्त रूप से योग्य व्यक्ति होना चाहिए और न्यायिक कामकाज करने वाली हर बेंच में ऐसा सदस्य शामिल होना चाहिए।

यह याचिका पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड, और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के खिलाफ दायर की गई है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए संयुक्त बिजली नियामक आयोग काम करता है। याचिका में कहा गया है कि इन आयोगों में खाली पदों और संरचना में कमियों के कारण उनके रेगुलेटरी और न्यायिक कामकाज पर असर पड़ता है और बिजली उपभोक्ताओं की असरदार कानूनी उपायों तक पहुंच कमजोर होती है।

याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु की स्थिति का ज़िक्र किया, जहां आयोग में तीनों पद - चेयरपर्सन, सदस्य (कानूनी) और सदस्य (तकनीकी) - खाली हैं। याचिका में कहा गया कि आंध्र प्रदेश में चेयरपर्सन और सदस्य (तकनीकी) के पद खाली हैं, जबकि आयोग सिर्फ़ एक सदस्य (वित्त) के साथ काम कर रहा है, जिनके पास कानूनी बैकग्राउंड नहीं है।

पश्चिम बंगाल के मामले में, याचिका में दावा किया गया कि सिर्फ़ चेयरपर्सन का पद बनाया गया है और उस पद पर बैठे व्यक्ति के पास ज़रूरी कानूनी योग्यता नहीं है। इसमें आगे कहा गया कि मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड के आयोगों में सिर्फ़ चेयरपर्सन का पद है, जिस पर ऐसे लोग बैठे हैं जिनके पास ज़रूरी कानूनी बैकग्राउंड नहीं है, जबकि सदस्य (कानूनी) और सदस्य (तकनीकी) के पद बनाए ही नहीं गए हैं।

याचिका में दूसरे राज्यों में खाली पदों की ओर भी इशारा किया गया। हिमाचल प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन में चेयरपर्सन का पद सितंबर 2025 से खाली है, जबकि सदस्य (कानूनी) का पद 1 जुलाई, 2026 से खाली है। मेघालय में सदस्य (कानूनी) का पद 10 दिसंबर, 2025 से खाली है और कहा जाता है कि चेयरपर्सन कानूनी पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए जॉइंट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन में सदस्य (तकनीकी) का पद 1 जुलाई, 2024 से खाली है।

'यूटिलिटी यूज़र्स वेलफेयर एसोसिएशन' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन में अदालत जैसी विशेषताएं होती हैं और उनमें ज़रूरी कानूनी योग्यता वाला सदस्य होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा था कि न्यायिक कामकाज करने वाली हर बेंच में ऐसा सदस्य शामिल होना चाहिए।

याचिका में कहा गया कि इस फ़ैसले का पालन न करने से विवादों को सुलझाने और बिजली उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनी ढांचे पर असर पड़ता है। इसमें तर्क दिया गया है कि कानूनी रूप से योग्य सदस्य की कमी को सिर्फ़ इसलिए ठीक नहीं माना जा सकता क्योंकि आयोग के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने का विकल्प मौजूद है।

इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 82 में राज्य बिजली नियामक आयोगों के गठन का प्रावधान है, धारा 84 में उनके अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यताओं के बारे में बताया गया है, और धारा 85 में चयन प्रक्रिया और चयन समिति के गठन का प्रावधान है।

याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि धारा 85 के तहत, किसी सदस्य के रिटायर होने या कार्यकाल खत्म होने से छह महीने पहले, और मृत्यु, इस्तीफ़े या हटाए जाने के कारण पद खाली होने के एक महीने के भीतर चयन प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। चयन समिति को रेफरेंस मिलने के तीन महीने के भीतर अपना चयन पूरा करना होता है।

याचिकाकर्ता ने पहले दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (DERC) में खाली पदों को लेकर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

29 मई, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने चयन समिति को DERC के अध्यक्ष और दो सदस्यों की नियुक्ति के लिए तुरंत कदम उठाने और दो महीने के भीतर चयन प्रक्रिया पूरी करने की कोशिश करने का निर्देश दिया।

नियुक्तियां होने के बाद कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया और याचिकाकर्ता को दूसरे राज्यों के संबंध में उचित कार्यवाही शुरू करने की छूट दी।

इसके बाद 'एनर्जी वॉचडॉग' ने यह याचिका दायर की, जिसमें प्रभावित आयोगों के कानूनी गठन और कानूनी ढांचे के अनुसार मौजूदा खाली पदों को भरने के लिए निर्देश देने की मांग की गई।

याचिकाकर्ता ने संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश से खाली पदों की स्थिति, चयन समितियों के गठन और नियुक्तियों की प्रगति के बारे में जानकारी देने की भी मांग की।

इसमें यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि जब तक आदेश का पालन नहीं हो जाता, तब तक न्यायिक कामकाज करने वाली कोई भी बेंच किसी मामले की सुनवाई या फ़ैसला न करे, जब तक कि उसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य कानूनी योग्यता रखने वाला सदस्य शामिल न हो।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रणव सचदेवा और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्रवीण गौर पेश हुए।

Case Title : Energy Watchdog v. State of West Bengal and Ors.

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: