कोयंबटूर श्मशान भूमि विवाद में समझौते की संभावना तलाशे ईशा फाउंडेशन: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने आज ईशा फाउंडेशन से कोयंबटूर के बाहरी इलाके में स्थापित उसके 'कायंथा स्थानम्' (श्मशान) से जुड़े भूमि विवाद को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने की संभावना तलाशने को कहा।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टीस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ कोयंबटूर के एक निवासी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने अपने घर के पास फाउंडेशन द्वारा श्मशान बनाए जाने पर आपत्ति जताई है।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने दलील दी कि स्थानीय नियमों के अनुसार ग्राम पंचायत की अनुमति के बिना किसी आवास या जलस्रोत के निकट श्मशान या कब्रिस्तान नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने नियम की गलत व्याख्या करते हुए 90 मीटर की दूरी पर लाइसेंस मिलने की स्थिति में प्रतिबंध लागू न होने की बात कही, जबकि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता का घर मात्र 10 मीटर की दूरी पर है।
भूषण ने कहा कि पिछले कुछ सप्ताह से वहां रोज शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है, जिससे भारी असुविधा हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता आदिवासी क्षेत्र में रहता है, जहां परंपरा के अनुसार शवों को दफनाया जाता है, जबकि यहां शहर से शव लाकर जलाए जा रहे हैं।
हालांकि, चीफ़ जस्टिस ने मामले के दूसरे पक्ष पर भी ध्यान देने की आवश्यकता बताई और कहा कि फाउंडेशन के सामाजिक कार्यों के कारण शवों को लावारिस नहीं छोड़ा जाता।
फाउंडेशन की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि याचिकाकर्ता ने स्वयं अपनी भूमि का एक हिस्सा फाउंडेशन को बेचा था और अब वह याचिका दायर कर रहा है। इस पर पूछे जाने पर भूषण ने माना कि भूमि बेची गई थी, लेकिन श्मशान बनाने के उद्देश्य से नहीं।
इसके बाद चीफ़ जस्टिस ने पक्षकारों से कहा कि वे याचिकाकर्ता के वर्तमान घर के बदले उचित मुआवजा देकर उसे किसी अन्य स्थान पर बसाने की संभावना तलाशें। उन्होंने कहा कि यदि उपयुक्त स्थान मिल जाए तो फाउंडेशन उसे उचित बाजार मूल्य देकर बेहतर रहने की व्यवस्था कर सकता है।
जस्टिस बागची ने भी टिप्पणी की कि कई शहरों—जैसे काशी और कोलकाता—में घरों के पास ही श्मशान होते हैं, जबकि दिल्ली में नगर नियोजन अपेक्षाकृत बेहतर है।
अंततः अदालत ने दर्ज किया कि दोनों पक्ष विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान की संभावना तलाशने पर सहमत हैं। अदालत ने कहा कि फाउंडेशन याचिकाकर्ता के आवास के लिए उचित और न्यायसंगत बाजार मूल्य देने पर विचार करेगा, ताकि वह अपनी पसंद के किसी अन्य स्थान पर बस सके। न्यायालय ने पक्षों से इस दिशा में गंभीरता से प्रयास करने का आग्रह किया।