14 साल से अधिक की सजा वाले मामलों में अपील किस बेंच को सुने—सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
सुप्रीम कोर्ट अब इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार करेगा कि कर्नाटक हाईकोर्ट में 14 वर्ष से अधिक की निश्चित अवधि की सजा वाले मामलों की अपील एकल पीठ सुने या खंडपीठ।
जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने दोषी बरकत की याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें इस मुद्दे को उठाया गया है।
मामले का विवरण
याचिकाकर्ता बरकत को 8 वर्षीय बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में 20 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।
ट्रायल कोर्ट ने उसे Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 (पॉक्सो अधिनियम) की धारा 6 के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी थी।
बाद में Karnataka High Court की एकल पीठ ने दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए प्रावधान में बदलाव किया और सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत माना।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडोकेट ए. सिराजुद्दीन ने दलील दी कि Karnataka High Court Act, 1961 की धारा 5 और 10 के अनुसार, 20 वर्ष जैसी लंबी अवधि की सजा वाले मामलों की सुनवाई खंडपीठ द्वारा की जानी चाहिए थी, न कि एकल पीठ द्वारा।
उन्होंने यह भी कहा कि उम्रकैद के मामलों में खंडपीठ का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन 14 वर्ष से अधिक की निश्चित अवधि की सजा वाले मामलों में स्थिति स्पष्ट नहीं है। कई हाईकोर्ट्स में 10 वर्ष से अधिक की सजा वाले मामलों की सुनवाई खंडपीठ द्वारा की जाती है।
घटना का विवरण
मामला एक 8 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म से जुड़ा है, जो आरोपी को जानती थी। गर्मी की छुट्टियों में बच्ची को उसके माता-पिता ने आरोपी के घर छोड़ा था, जहां उसने मौके का फायदा उठाकर अपराध किया। बाद में शिकायत पर बच्ची को अस्पताल ले जाया गया और एफआईआर दर्ज की गई।
हाईकोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और 20 वर्ष की सजा को बरकरार रखा, लेकिन यह माना कि घटना के समय पॉक्सो संशोधन 2019 लागू नहीं हुआ था और भारतीय दंड संहिता के तहत अधिक कठोर सजा का प्रावधान था।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सवाल
अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि—
क्या 14 वर्ष से अधिक की सजा वाले मामलों में अपील की सुनवाई अनिवार्य रूप से खंडपीठ द्वारा होनी चाहिए?
या एकल पीठ द्वारा सुनवाई भी वैध मानी जाएगी?
यह मामला केवल एक दोषी की सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के हाईकोर्ट्स में अपील की सुनवाई की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देगा।