क्या कुछ आरोपियों से समझौते के आधार पर FIR आंशिक रूप से रद्द की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने विचार हेतु एमिकस नियुक्त किया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर को एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया है, ताकि यह विचार किया जा सके कि क्या पक्षकारों के बीच समझौता होने पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 (या BNDS की धारा 528) के तहत कई आरोपियों में से केवल एक आरोपी के खिलाफ आपराधिक मामला या FIR आंशिक रूप से रद्द (quash) की जा सकती है।
जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश उस मामले में पारित किया, जिसमें शिकायतकर्ता और एक आरोपी के बीच समझौता हो गया था और आरोपी ने अपने विरुद्ध एफआईआर को आंशिक रूप से रद्द करने की मांग की थी।
यह FIR भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120B (आपराधिक साजिश), 380 (घर में चोरी) और 411 (चोरी की संपत्ति रखना) के तहत दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ता ने पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया था। वहां सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने संबंधित मजिस्ट्रेट से रिपोर्ट मांगी, जिसमें पुष्टि हुई कि पक्षकारों ने अपनी इच्छा से समझौता किया है। हालांकि, इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश या पूर्व उदाहरण (precedent) न होने के कारण मामला खंडपीठ को भेज दिया गया।
12 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह निर्णय दिया कि एफआईआर का आंशिक रूप से निरस्तीकरण (partial quashing) स्वीकार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट प्रांजल किशोर ने दलील दी कि इस मुद्दे पर विभिन्न हाईकोर्ट्स के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता का नाम मूल एफआईआर में नहीं था, बल्कि सह-आरोपी के बयान के आधार पर बाद में उसे आरोपी बनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए फिलहाल केवल याचिकाकर्ता के संबंध में चल रही ट्रायल कार्यवाही पर रोक लगा दी है। अब अदालत इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार करेगी कि क्या समझौते के आधार पर केवल एक आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त की जा सकती है या नहीं।