सुप्रीम कोर्ट ने CAA के तहत सुरक्षित शरणार्थियों की नागरिकता पर फैसला लेने के लिए केंद्र सरकार को समय-सीमा तय करने में हिचकिचाहट दिखाई

Update: 2026-03-24 14:23 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के लिए उन आवेदनों पर फैसला लेने की समय-सीमा तय करने में हिचकिचाहट दिखाई, जिनमें नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (CAA) के तहत भारतीय नागरिकता मांगी गई। कोर्ट ने कहा कि यह एक कार्यकारी फैसला है, जिसमें "कम से कम न्यायिक दखल" ही उचित है।

कोर्ट पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आए उन शरणार्थियों के लिए नागरिकता मांगने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जो CAA के लाभ के हकदार हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह आशंका जताई कि SIR प्रक्रिया में उन्हें मताधिकार से वंचित किया जा सकता है, क्योंकि उनके CAA आवेदनों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि वैधानिक व्यवस्था (नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019) पहले से मौजूद है, और अब यह केंद्र सरकार को देखना है कि वह इसे कैसे लागू करती है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ NGO 'आत्मदीप' द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें हिंदू, बौद्ध, ईसाई और जैन शरणार्थियों की सुरक्षा के लिए दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार किया गया था। ये शरणार्थी 2014 से पहले भारत में आए थे, लेकिन उन्हें अभी तक नागरिकता नहीं मिली है।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील करुणा नंदी ने दलील दी कि CAA का उद्देश्य कुछ खास अल्पसंख्यकों के लिए (प्राकृतिकरण की) समय-सीमा को 11 साल से घटाकर 5 साल करना था। उन्होंने कहा कि CAA नियम अधिसूचित हुए दो साल बीत चुके हैं, लेकिन आवेदन अभी भी लंबित हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोर्ट को इसके लिए एक समय-सीमा तय करनी चाहिए।

नंदी ने कोर्ट से आग्रह करते हुए कहा,

"ये अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यक हैं। हमारी प्रार्थना है कि नागरिकता अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अनुरूप इस प्रक्रिया में तेज़ी लाई जाए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह मामला केंद्र सरकार और उसके द्वारा गठित अधिकार प्राप्त समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है। हम केवल एक समय-सीमा तय करने की मांग कर रहे हैं। दो साल बीत चुके हैं। अधिनियम का उद्देश्य समय-सीमा को 11 साल से घटाकर 5 साल करना था। अब दो और साल बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई समय-सीमा तय नहीं की गई। अगर वे कोई समय-सीमा तय करने का वादा कर लें, तो यह काम पूरा हो जाएगा।"

इन दलीलों के जवाब में CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट इस मामले में ज़्यादा दखल नहीं देना चाहेगा, क्योंकि इसके लिए एक नई वैधानिक व्यवस्था पहले से ही मौजूद है।

CJI ने कहा,

"यह एक ऐसा मामला है, जहां हम चाहते हैं कि न्यायिक दखल कम से कम हो, क्योंकि उन्हें चीज़ों को वेरिफ़ाई करना है... अब क़ानून मौजूद है। संशोधित क़ानून आपके पक्ष में है। पक्ष में होने का मतलब यह है कि अब नए क़ानूनी दायरे में उम्मीद की किरण है... अब वे इसे कैसे लागू करेंगे, यह आपको उनकी मशीनरी पर छोड़ना होगा - जैसे वेरिफ़िकेशन का काम तथ्यों की जांच वगैरह।"

ग़ौरतलब है कि नंदी ने यह भी बताया कि इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट के सामने हलफ़नामे के ज़रिए अपना जवाब पेश करने के लिए 3 हफ़्ते का समय मांगा था।

इस संबंध में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा,

"इस पर काम चल रहा है। हलफ़नामा पेश न करने की वजह इसमें कोई दिलचस्पी न होना नहीं है।"

केंद्र सरकार से "ठोस जवाब" की मांग करते हुए बेंच ने इस मामले को दोबारा सूचीबद्ध किया।

इससे पहले भी कोर्ट ने इस मामले में दखल देने में हिचकिचाहट दिखाई थी और CAA आवेदकों को वोटर लिस्ट में शामिल करने की अर्ज़ी को यह कहते हुए ख़ारिज किया था कि सबसे पहले नागरिकता हासिल करना ज़रूरी है, उसके बाद ही किसी और चीज़ की मांग की जा सकती है।

Case Title: AATMADEEP v. THE UNION OF INDIA | SLP(C) No. 034474/2025

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