सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी रोक के मामलों में अदालतों द्वारा 'मिनी-ट्रायल' करने की आलोचना की

Update: 2026-08-13 09:17 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (12 अगस्त) को सिविल प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure) के तहत अंतरिम आदेश (Interlocutory Order) जारी करने के चरण में 'मिनी-ट्रायल' करने की प्रथा की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि अस्थायी रोक की अर्जी पर सुनवाई करते समय अदालतों को अपनी बात केवल 'प्रथम दृष्टया मामला' (Prima Facie Case), 'सुविधा का संतुलन' (Balance of Convenience) और 'अपूरणीय क्षति' (Irreparable Injury) के अस्तित्व तक ही सीमित रखनी चाहिए।

जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा,

"हम अस्थायी रोक की अर्जियों पर अंतरिम चरण में या अपील के दौरान गुण-दोष (Merits) पर आधारित लंबे आदेश लिखने की प्रथा को सही नहीं मानते। हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अदालतें ऐसे आदेशों को केवल तीन तय शर्तों - प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति - पर अपने निष्कर्षों को कारणों सहित दर्ज करने तक सीमित रखें। उन्हें मुकदमे के दौरान उठने वाले मुद्दों के अंतिम गुण-दोष या संभावित नतीजों की जांच में नहीं पड़ना चाहिए।"

कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के उस आदेश को रद्द किया, जिसने सिंगल जज द्वारा पारित अंतरिम आदेश में दखल दिया था। सिंगल जज का आदेश 'वांडर लिमिटेड और अन्य बनाम एंटॉक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' (1990 Supp. SCC 727) मामले में तय कानून के अनुसार था, जिसमें कहा गया कि "निचली अदालत के विवेक के इस्तेमाल में दखल तभी जायज़ है जब उसका इस्तेमाल मनमाने, सनकी या गलत तरीके से किया गया हो, या अस्थायी रोक देने या न देने को नियंत्रित करने वाले कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ किया गया हो।"

इस मामले में हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने 'मिनी-ट्रायल' किया और सिंगल जज के आदेश में दखल दिया। सिंगल जज ने भी इसी तरह 'मिनी-ट्रायल' किया था और अपीलकर्ता-वादी के पक्ष में अंतरिम रोक का आदेश दिया था, जिसमें प्रतिवादी-प्रतिवादी को मुकदमे के लंबित रहने के दौरान संबंधित संपत्ति को हस्तांतरित करने से रोका गया।

यह विवाद 5 दिसंबर, 2009 को देविंदर सिंह चौधरी की मृत्यु के बाद शुरू हुआ। मूल वादी ने आरोप लगाया कि उनकी पोती और पोती के पति ने उनकी बुढ़ापे की स्थिति का फायदा उठाया और धोखाधड़ी के ज़रिए लगभग 1,000 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर और LLP हिस्सेदारी अपने नाम करवा ली। सिंगल जज ने 29 जुलाई, 2022 को एक अंतरिम आदेश (Interim Injunction) जारी किया। इसमें उन्होंने वसीयत की व्याख्या, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 और अनुचित प्रभाव (Undue Influence) जैसे मुद्दों पर सात विस्तृत निष्कर्ष निकाले।

डिविजन बेंच ने 20 मार्च, 2026 को अपना खुद का 'मिनी-ट्रायल' किया और बारह विस्तृत निष्कर्षों के साथ उस आदेश को पलट दिया।

इससे असंतुष्ट होकर वादी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

जस्टिस अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में डिविजन बेंच का निर्णय रद्द कर दिया गया और सिंगल जज के फैसले को बहाल किया गया। साथ ही कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करने के चरण में 'मिनी-ट्रायल' करने और उस आदेश के खिलाफ अपील की सुनवाई करने की आलोचना की।

कोर्ट ने कहा,

"आदेश एक ही वजह से लंबे हो जाते हैं: आदेश देने वाली अदालत - चाहे जानबूझकर हो या अनजाने में - विवाद के मुख्य गुण-दोष (merits) पर विचार करने लगती है और असल में हलफनामों और दस्तावेजों के आधार पर एक 'मिनी-ट्रायल' करती है, जबकि इन पर सबूत पेश किए जाने का इंतजार किया जाना चाहिए... ऑर्डर XXXIX की यह मांग नहीं है और न ही कानून इसकी इजाज़त देता है - चाहे वह शुरुआती अदालत हो या उसकी समीक्षा करने वाली अपीलीय अदालत।"

कोर्ट ने कोलगेट पामोलिव (इंडिया) लिमिटेड बनाम हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड, (1999) 7 SCC 1 का हवाला देते हुए यह बात कही,

“इस कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोर्ट शुरुआती चरण (Interlocutory Stage) में कानून या तथ्यों से जुड़े मुश्किल सवालों पर फ़ैसला लेने से बचता है। ऑर्डर XXXIX के तहत किसी अर्ज़ी पर जांच का दायरा – और ऐसी अर्ज़ी पर दिए गए आदेश के ख़िलाफ़ अपील का दायरा भी – सिर्फ़ इस शुरुआती सवाल तक सीमित होता है कि क्या वादी ने कोई ऐसा गंभीर विवाद दिखाया है जिस पर ट्रायल के दौरान जांच की ज़रूरत है; इसमें दलीलों (Pleadings) के साथ लगाए गए दस्तावेज़ों के अंतिम असर, सबूत के तौर पर उनकी अहमियत या उनके असल गुण-दोष की जांच शामिल नहीं है – यह ट्रायल कोर्ट का काम है, जो सबूत पेश होने के बाद किया जाना चाहिए, उससे पहले नहीं।”

कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

“डिविज़न बेंच ने बारह विस्तृत निष्कर्षों के ज़रिए 26.03.2004 की वसीयत की अलग-अलग धाराओं की व्याख्या की, देरी और एक अलग मुक़दमे में की गई मानी जाने वाली स्वीकारोक्तियों के असर को परखा, तथ्यों पर कंपनीज़ एक्ट, 2013 की धारा 89 लागू की, और यह आकलन किया कि क्या खास अधिग्रहणों और खास प्राप्तियों के बीच कोई “साफ़ प्रथम दृष्टया संबंध” (clear prima facie nexus) दिखाया गया। इनमें से हर एक बात असल मामले से जुड़ी है और ट्रायल के लिए सही तौर पर सुरक्षित रखी जानी चाहिए; इनमें से कोई भी ऐसा मामला नहीं है, जिस पर अपीलीय कोर्ट – जिसका काम सिर्फ़ यह देखना है कि क्या सिंगल जज ने अपने विवेक का इस्तेमाल ग़लत या मनमाने ढंग से किया – सबूतों के बारे में अपनी समझ को लागू कर सके।”

नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई। सिंगल जज द्वारा पारित आदेश बहाल कर दिया गया।

Cause Title: SHRUTI MANAV SHARMA & ANR. VERSUS SUNANINA SINGH & ORS.

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