परिवार ने कभी साथ नहीं छोड़ा: सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के माता-पिता की सराहना की, कहा- सच्चा प्रेम सबसे कठिन समय में साथ निभाना

Update: 2026-03-11 10:18 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने देश के पहले निष्क्रिय इच्छामृत्यु मामले में 13 वर्षों से स्थायी वनस्पति अवस्था में पड़े हरीश राणा के जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति देते हुए उनके माता-पिता और परिवार की संवेदनशीलता व समर्पण की सराहना की। अदालत ने कहा कि सच्चा प्रेम वही है जो जीवन के सबसे कठिन और दुखद समय में भी साथ निभाए।

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा के जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी। हरीश वर्ष 2012 में एक इमारत से गिरने के बाद गंभीर मस्तिष्क चोट का शिकार हो गए और तब से स्थायी वनस्पति अवस्था में थे। अदालत द्वारा गठित दो चिकित्सा बोर्डों ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है और वह केवल चिकित्सकीय पोषण व्यवस्था के सहारे जीवित हैं।

संवेदनशील मामले को देखते हुए खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान हरीश के माता-पिता से मुलाकात भी की थी। फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि जब वर्षों से हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और उपचार से केवल जैविक जीवन ही लंबा हो रहा है तो इसे जारी रखना मरीज के हित में नहीं है।

फैसला लिखते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि यह मामला जीवन की नश्वरता और उसकी अनिश्चितता को सामने लाता है। उन्होंने कहा कि पिछले 13 वर्षों से हरीश ने पीड़ा और कष्ट से भरा जीवन जिया, लेकिन इस दौरान उनका परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा।

अदालत ने कहा कि हरीश के माता-पिता और भाई-बहनों ने हर परिस्थिति में उनका साथ दिया और उनकी देखभाल की। यह सच्चे प्रेम और समर्पण का उदाहरण है। अदालत ने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं बल्कि अपने लोगों द्वारा छोड़ दिया जाना है, लेकिन हरीश के मामले में ऐसा कभी नहीं हुआ।

जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि प्रेम का असली अर्थ यही है कि खुशी के समय ही नहीं बल्कि सबसे कठिन और निराशाजनक क्षणों में भी किसी के साथ खड़े रहा जाए।

जस्टिस के. वी. विश्वनाथन ने अपने सहमति मत में कहा कि हरीश के माता-पिता और भाई-बहनों ने उनके इलाज और देखभाल के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। जब यह स्पष्ट हो गया कि अब सुधार की कोई संभावना नहीं है, तभी उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

उन्होंने एक संस्कृत श्लोक का भी उल्लेख किया-

“चिता चिन्ता समाप्रोक्ता बिन्दुमात्रं विशेषता।

सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता॥”

अर्थात चिता और चिंता में केवल थोड़ा सा अंतर है चिता मृत शरीर को जलाती है जबकि चिंता जीवित व्यक्ति को जलाती है।

यह याचिका हरीश के पिता द्वारा दायर की गई। उन्होंने पहले 2024 में भी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी लेकिन तब अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया था और उत्तर प्रदेश सरकार को उनके इलाज का खर्च उठाने का निर्देश दिया।

बाद में पिता ने नई अर्जी दाखिल कर बताया कि बेटे की हालत और बिगड़ गई और किसी उपचार से कोई सुधार नहीं हो रहा। इसके बाद अदालत ने मेडिकल जांच के लिए प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड गठित किए। दोनों बोर्डों ने रिपोर्ट दी कि हरीश के ठीक होने की संभावना नहीं है।

इन रिपोर्टों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी। यह फैसला 2018 के कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामला में तय दिशा-निर्देशों के तहत दिया गया, जिसमें गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को मान्यता दी गई।

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