UAPA मामलों की सुनवाई एक साल में पूरी करें: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से मांगा स्पेशल कोर्ट का खाका

Update: 2026-03-24 09:48 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने UAPA जैसे गंभीर मामलों में लंबित ट्रायल को तेजी से निपटाने के लिए बड़ा निर्देश देते हुए 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पूछा कि एक साल के भीतर सुनवाई पूरी करने के लिए उन्हें कितनी स्पेशल कोर्ट की जरूरत है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि राज्य सरकारें यह तय करें कि UAPA मामलों की रोजाना सुनवाई के लिए कितनी एक्सक्लूसिव अदालतें स्थापित करनी होंगी। साथ ही यह स्पष्ट प्रतिबद्धता भी देनी होगी कि हर ट्रायल हर हाल में एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाएगा।

अदालत ने राज्यों को चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित हाइकोर्ट आवश्यक कदम उठाकर इन अदालतों के लिए पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति सुनिश्चित करें। साथ ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और अन्य जांच एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि हर ऐसी अदालत के लिए कम से कम समर्पित लोक अभियोजक उपलब्ध कराया जाए।

जहां अभियोजकों की कमी हो, वहां केंद्र और राज्य सरकारें हाइकोर्ट से परामर्श कर विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति करें।

अदालत ने 17 राज्यों के रजिस्ट्रार जनरल को भी नोटिस जारी कर इस मुद्दे पर उनका जवाब मांगा।

यह आदेश अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर चल रहे मामले में दिया, जिसमें UAPA और अन्य विशेष कानूनों जैसे मकोका कानून के मामलों में लंबित ट्रायल को लेकर चिंता जताई गई।

पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सभी 17 राज्यों ने फिलहाल एक-एक स्पेशल कोर्ट स्थापित करने पर सहमति जताई, जिसे केंद्र सरकार वित्तीय सहायता देगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इन विशेष अदालतों में तैनात जजों के कार्य मूल्यांकन (ACR) के लिए अलग व्यवस्था बनाई जाए, क्योंकि वे पारंपरिक तरीके से काम का मूल्यांकन नहीं कर पाएंगे।

गौरतलब है कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार विशेष कानूनों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए अलग अदालतें बनाने पर जोर दे चुका है। अदालत ने न्यायिक अधिकारियों की संख्या बढ़ाने और पूरे देश में एक समान व्यवस्था विकसित करने की भी बात कही थी।

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