“डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ब्लैकमेलिंग 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी”: सीजेआई सूर्यकांत

Update: 2026-03-21 08:42 GMT

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उस बयान से सहमति जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म “ब्लैकमेलर” की तरह काम करते हैं। सीजेआई ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की ब्लैकमेलिंग “डिजिटल अरेस्ट” जैसी है।

यह टिप्पणी उस समय की गई जब चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पुलिस द्वारा आरोपियों की तस्वीरें आधिकारिक सोशल मीडिया खातों पर पोस्ट करने की प्रथा को विनियमित करने की मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जहां मुख्यधारा का मीडिया काफी हद तक जिम्मेदारी से काम कर रहा है, वहीं सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं और वर्चुअल प्लेटफॉर्म्स के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “अब हर मोबाइल रखने वाला व्यक्ति मीडिया बन गया है। कुछ प्लेटफॉर्म ऐसे हैं जो केवल वर्चुअल रूप से मौजूद हैं और ब्लैकमेलर की तरह काम करते हैं, बल्कि 'ब्लैकमेलिंग' शब्द भी कम है।”

इस पर सहमति जताते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “यह किसी प्रकार का डिजिटल अरेस्ट ही है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह कोई अपराध नहीं है।” जस्टीस जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि “वातावरण-प्रभावित सोशल मीडिया” आज के समय की एक नई चुनौती बन गया है।

चीफ़ जस्टिस ने समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सड़क पर कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होकर पड़ा हो, तो लोग उसकी मदद करने के बजाय मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगते हैं।

हाल ही में, सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को उन सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं और वेबसाइट्स की पहचान करने का निर्देश दिया था, जिन्होंने एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद पर न्यायालय के आदेश के बाद गैर-जिम्मेदाराना सामग्री पोस्ट की थी। इससे पहले भी सीजेआई ऑनलाइन मीडिया के नियमन की आवश्यकता पर जोर दे चुके हैं।

मौजूदा याचिका के संदर्भ में, न्यायालय ने कहा कि उसने हाल ही में राज्यों को पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि आरोपियों की हथकड़ी लगाए, रस्सियों से बांधे या पिटाई करते हुए तस्वीरें पोस्ट करना अपमानजनक है और इससे जनता के मन में आरोपियों के प्रति पूर्वाग्रह पैदा होता है, जिससे सोशल मीडिया ट्रायल को बढ़ावा मिलता है।

पीठ ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता अन्य मामले में राज्यों द्वारा बनाए जाने वाले दिशा-निर्देशों के परिणाम का इंतजार करे। फिलहाल, याचिकाकर्ता को अपनी याचिका में संशोधन करने की अनुमति दे दी गई है।

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