ईसाई धर्म को 'एकमात्र सच्चा' बताने पर पादरी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने आज (10 अप्रैल) एक ईसाई पादरी की याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया था कि किसी धर्म को “एकमात्र सच्चा धर्म” बताना भारतीय दंड संहिता की धारा 295A के तहत अपराध हो सकता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए पादरी रेवरेन्ड फादर विनीत विन्सेंट परेरा के खिलाफ आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी।
मामला क्या है?
यह मामला उस FIR से जुड़ा है जिसमें आरोप लगाया गया कि पादरी प्रार्थना सभाओं के दौरान यह कहते थे कि ईसाई धर्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है, जिससे अन्य धर्मों, विशेष रूप से हिंदू धर्म की भावनाएं आहत हुईं।
हालांकि, प्रारंभिक जांच में यह पाया गया कि कोई अवैध धर्मांतरण नहीं हुआ, फिर भी पुलिस ने अन्य धर्मों की आलोचना के आरोप में चार्जशीट दाखिल कर दी।
हाईकोर्ट का रुख
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 18 मार्च को पादरी की FIR रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि—
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है
यहां सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है
ऐसे में किसी धर्म को “एकमात्र सच्चा” बताना अन्य धर्मों को कमतर दिखाने जैसा है
सुप्रीम कोर्ट में दलील
पादरी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने कहा—
उनके मुवक्किल को झूठे मामले में फंसाया जा रहा है
FIR के आधार पर धारा 295A का कोई मामला नहीं बनता
मजिस्ट्रेट ने बिना पर्याप्त साक्ष्य के संज्ञान ले लिया
कोर्ट की कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए—
उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा
पादरी के खिलाफ चल रही आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी
अब इस मामले में आगे सुनवाई के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।