'लीगल प्रोफेशन में “ब्लैक शीप” पर तुरंत कार्रवाई जरूरी' : सुप्रीम कोर्ट ने BCI से मांगा जवाबदेही पर जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि विधिक पेशे (लीगल प्रोफेशन) में मौजूद “ब्लैक शीप” से तुरंत निपटना आवश्यक है, ताकि पेशे की साख और ईमानदारी बनी रहे। कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से उसके अनुशासनात्मक तंत्र की प्रभावशीलता और समयबद्धता पर सवाल उठाए।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें एक वकील को कथित रूप से धोखाधड़ी के आरोप में एक बैंक द्वारा ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था। बैंक ने अन्य बैंकों को भी सूचित किया था कि संबंधित वकील भरोसेमंद नहीं है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने पेशेवर नियामक संस्थाओं के कामकाज और वकीलों के खिलाफ शिकायतों पर मिलने वाले राहत तंत्र को लेकर व्यापक चिंता जताई। कोर्ट ने पूछा कि क्या BCI और राज्य बार काउंसिल्स ने कभी अपने कामकाज का प्रभाव (impact assessment) आंका है।
कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि किसी वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार की शिकायत पर क्लाइंट को राहत पाने में कितना समय लगता है और शिकायतों का निपटारा कितनी दक्षता से होता है। अदालत ने कहा कि बार काउंसिल के चुनाव तो नियमित होते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्लाइंट को इससे क्या फायदा मिल रहा है।
“लगातार चुनाव हो रहे हैं, लेकिन क्लाइंट पर इसका क्या असर पड़ता है?” कोर्ट ने पूछा। अदालत ने यह भी कहा कि क्लाइंट के पास उपलब्ध वैधानिक उपाय सीमित हैं, क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मिलने वाले उपाय भी लीगल प्रोफेशन पर लागू नहीं होते।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का उद्देश्य पेशे की आलोचना नहीं, बल्कि उसे मजबूत बनाना है। “हम यह पेशे के सुधार के लिए कह रहे हैं, ताकि वकील एक ऐसी संस्था के रूप में काम करें जो ईमानदारी और दक्षता के साथ सेवाएं दे सके,” खंडपीठ ने कहा।
अदालत ने कहा कि पेशे में ढिलाई या गैर-पेशेवर आचरण के मामलों में नियामक संस्थाओं को “दो कदम आगे” रहकर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि बाकी पेशा बेहतर तरीके से आगे बढ़ सके और तय मानकों के अनुरूप सेवाएं दे सके।
BCI की ओर से पेश वकील ने बताया कि एडवोकेट्स एक्ट के तहत पहले से ही अनुशासनात्मक तंत्र मौजूद है। कानून के अनुसार, राज्य बार काउंसिल को एक साल के भीतर शिकायतों का निपटारा करना होता है, अन्यथा मामला स्वतः BCI को ट्रांसफर हो जाता है।
इसके बावजूद कोर्ट ने जवाबदेही पर जोर देते हुए पूछा कि क्या BCI हर साल मिलने वाली शिकायतों और उनके निपटारे की दक्षता का मूल्यांकन करता है। “क्या आपने कभी अपने प्रदर्शन की समीक्षा की है?” कोर्ट ने सवाल किया।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि आम धारणा बनती जा रही है कि विधिक पेशे के मानक गिर रहे हैं, और इसे सुधारने के लिए गलत आचरण करने वाले सदस्यों पर त्वरित कार्रवाई जरूरी है।
“एक सामान्य धारणा है कि यह पेशा नीचे जा रहा है। अगर 'ब्लैक शीप' हैं, तो क्या आपने उनसे तुरंत निपटा है? यह पेशे की रक्षा के लिए है, उसे बदनाम करने के लिए नहीं,” कोर्ट ने कहा।
अदालत ने BCI के वकील को निर्देश दिया कि वह चेयरमैन और अन्य पदाधिकारियों को यह संदेश दें कि वे अपने कामकाज का प्रभाव आकलन करें।
मामले में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने कहा कि केवल शिकायत मिलने पर किसी वकील को डिबार करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि शिकायतों का निपटारा एडवोकेट्स एक्ट के तहत सक्षम प्राधिकरण द्वारा ही होना चाहिए।
उन्होंने बैंकों द्वारा 'कौशन लिस्ट' जारी करने की प्रथा पर भी सवाल उठाया और कहा कि किसी वकील की पेशेवर प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाले फैसले कानूनी विशेषज्ञों द्वारा ही लिए जाने चाहिए।
जस्टिस नरसिम्हा ने यह भी स्पष्ट किया कि लीगल प्रोफेशन को व्यवसाय नहीं माना जाता, इसलिए उस पर उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू नहीं होता। उन्होंने कहा कि इस कारण क्लाइंट्स को राहत पाने में कठिनाई होती है और बार काउंसिल्स को इस दिशा में अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनना होगा।
मामले की सुनवाई जारी है।