जमानत अर्ज़ियों में ज़रूरी जानकारियों का खुलासा अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट्स को दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए देशभर के हाइकोर्ट्स को निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जमानत अर्ज़ियों में कुछ बुनियादी और आवश्यक जानकारियों का उल्लेख होना चाहिए ताकि अदालतें मामले को सही परिप्रेक्ष्य में परख सकें।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने यह निर्देश उस मामले में दिए, जिसमें एक व्यक्ति को फर्जी एलएलबी डिग्री हासिल करने और जाली डिग्रियों की आपूर्ति का रैकेट चलाने के आरोप में दी गई जमानत को रद्द किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य रूप से जमानत अर्ज़ियों में निम्नलिखित जानकारियां अवश्य होनी चाहिए-
1. FIR नंबर और तारीख।
2. संबंधित थाना।
3. जांच एजेंसी द्वारा लगाई गई धाराएं।
4. आरोपित अपराधों की अधिकतम सजा।
5. गिरफ्तारी की तारीख और अब तक की हिरासत की अवधि।
6. मुकदमे की वर्तमान स्थिति।
7. प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं के पालन का विवरण।
8. आरोपी का आपराधिक इतिहास (यदि कोई हो)।
9. पहले दायर की गई जमानत अर्ज़ियों का विवरण व उनकी स्थिति।
कोर्ट ने हाइकोर्ट्स से कहा कि वे अपनी नियम बनाने की शक्ति के तहत उपयुक्त प्रशासनिक निर्देश जारी करें या अपने नियमों में आवश्यक प्रावधान जोड़ें ताकि जमानत आदेशों में इन जानकारियों का स्पष्ट उल्लेख हो। साथ ही इस फैसले की प्रति सभी हाइकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने और जिला न्यायपालिका में मार्गदर्शन के लिए प्रसारित करने का भी निर्देश दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा मजहर खान नामक व्यक्ति को दी गई जमानत से जुड़ा है। आरोप है कि उसने सरवोदय ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन से फर्जी एलएलबी डिग्री हासिल की और एलएलबी, एलएलएम व पीएचडी जैसी डिग्रियों का उल्लेख करते हुए विज़िटिंग कार्ड छपवाए। FIR में यह भी आरोप लगाया गया कि वह जाली डिग्रियां उपलब्ध कराने का नेटवर्क चला रहा था।
हाइकोर्ट में आरोपी ने दावा किया कि उसकी डिग्री असली है और वैध रूप से जारी की गई। उसने यह भी कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे हैं और यह मामला संपत्ति विवाद के कारण उसकी भाभी द्वारा दर्ज कराया गया। राज्य सरकार और शिकायतकर्ता ने जमानत का विरोध किया।
हालांकि, हाइकोर्ट ने यह कहते हुए जमानत दी कि साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना का कोई ठोस आधार नहीं है। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां न केवल जमानत रद्द की गई बल्कि पूरे देश की अदालतों के लिए जमानत अर्ज़ियों से जुड़ी स्पष्ट दिशानिर्देश भी तय कर दिए गए।