सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और CPCB से 'एनवायरनमेंट रिलीफ फंड' के इस्तेमाल के बारे में जानकारी मांगी
सुप्रीम कोर्ट ने 'पब्लिक लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्ट' के तहत बनाए गए "एनवायरनमेंट रिलीफ फंड" (ERF) के बारे में भारत सरकार और CPCB (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) से विस्तृत हलफनामा मांगा।
बता दें, ERF को खतरनाक सामान ले जाने वाले वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं के पीड़ितों को आर्थिक मदद देने के लिए बनाया गया। सड़क पर गाड़ी चलाने वाले व्यक्ति के पास थर्ड-पार्टी रिस्क को कवर करने वाली पॉलिसी होनी चाहिए, लेकिन खतरनाक सामान ले जाने वालों के पास PLIA के तहत अतिरिक्त बीमा भी होना चाहिए। इसके बनने के बाद से ERF में 1000 करोड़ रुपये से ज़्यादा जमा होने की बात कही गई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने जबलपुर के सोशल एक्टिविस्ट ज्ञान प्रकाश की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह हलफनामा मांगा। उनकी गुज़ारिश पर बेंच ने इस मामले में एक 'एमिकस क्यूरी' (अदालत की मदद करने वाला वकील) नियुक्त करने पर भी सहमति जताई।
याचिकाकर्ता ज्ञान प्रकाश ने खुद पेश होकर मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 146(1) का ज़िक्र किया, जो थर्ड-पार्टी रिस्क के खिलाफ़ बीमा की ज़रूरत से संबंधित है। इस प्रावधान की शर्त इस प्रकार है:
"बशर्ते कि खतरनाक या जोखिम भरे सामान ले जाने वाले या ले जाने के लिए बने वाहन के मामले में पब्लिक लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्ट, 1991 (1991 का 6) के तहत भी बीमा पॉलिसी होनी चाहिए।"
उन्होंने बताया कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं के कारण रोज़ाना लगभग 600 लोग मारे जाते हैं और उनमें से ज़्यादातर के पास बीमा नहीं होता है। पब्लिक लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्ट के तहत पर्यावरण मंत्रालय को नोडल एजेंसी बनाया गया। उनकी अवमानना याचिका पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद "एनवायरनमेंट रिलीफ फंड" बनाया गया, जिसके तहत बीमा प्रीमियम के तौर पर 1500 करोड़ रुपये जमा किए गए, लेकिन इसमें से किसी को भी भुगतान नहीं किया गया।
जब CJI ने पूछा कि इस फंड के हकदार कौन हैं तो याचिकाकर्ता ने जवाब दिया,
"वे लोग जो इन खतरनाक पदार्थों के कारण मारे गए या घायल हुए हैं"।
उन्होंने कौशांबी की हालिया घटना का भी ज़िक्र किया, जब एक LPG टैंकर टोल प्लाज़ा से टकरा गया और 5 लोगों की मौत हो गई। इसके विपरीत, केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि इस याचिका के दायर होने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने एक आदेश पारित किया, जिसमें सभी बातें शामिल थीं। उन्होंने कहा कि बाद में एमवी एक्ट में भी संशोधन किया गया था।
CJI कांत के एक खास सवाल पर यह भी बताया गया कि 2020 तक ERF में लगभग 881 करोड़ रुपये जमा हो गए और CPCB इसका प्रबंधन कर रहा था। बेंच ने गौर किया कि 2021 के आखिर तक यह रकम बढ़कर लगभग 1000 करोड़ रुपये हो गई।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि पर्यावरण मंत्रालय और CPCB गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम कर रहे थे। इसके अलावा, उन्होंने बताया कि CPCB फंड मैनेजर के तौर पर हर साल 10 करोड़ रुपये चार्ज करता है।
इन दलीलों को सुनने के बाद CJI ने केंद्र सरकार से फंड के बारे में जानकारी (जैसे कि उसमें कितनी रकम है और क्या उसमें से कोई भुगतान किया गया) पता लगाने को कहा। चूंकि रिकॉर्ड में इस बात का कोई ब्योरा नहीं था कि कितनी रकम (अगर कोई हो) जारी की गई, इसलिए कोर्ट ने कहा कि (केंद्र सरकार और CPCB के) हलफनामों में फंड के इस्तेमाल की योजना के बारे में बताया जाना चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता की कोशिशों की सराहना भी की। कोर्ट ने कहा कि वे एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता लगते हैं, जो अच्छे शासन में पक्का यकीन रखते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में 2006 के हाईकोर्ट के आदेश (याचिकाकर्ता के मामले में) का ब्योरा भी शामिल किया, जिसके तहत ERF बनाया गया। कार्यवाही खत्म होने से पहले याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि पैदल चलने वालों से जुड़ी एक और PIL भी लंबित है।
Case Title: GYAN PRAKASH v. UNION OF INDIA AND ORS. W.P.(C) No. 1093/2019