सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में मुकदमों में "समझ से बाहर और भारी देरी" पर फिर से चिंता जताई
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर महाराष्ट्र में मुकदमों में होने वाली समझ से बाहर की देरी पर चिंता जताई।
कोर्ट ने कहा,
"एक बात जिसने कोर्ट को गंभीर रूप से चिंतित किया, वह यह है कि कोर्ट बार-बार देख रहा है कि मुकदमों के संचालन में, खासकर महाराष्ट्र राज्य द्वारा, समझ से बाहर और भारी देरी हो रही है।"
जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने ज़मानत याचिका पर नोटिस जारी किया और नासिक के पुलिस कमिश्नर से एक व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा मांगा, जिसमें जून 2019 में दर्ज एक मामले में मुकदमे के संचालन में हुई देरी का स्पष्टीकरण दिया गया हो।
अभियोजन पक्ष की आलोचना करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि जून 2019 में FIR दर्ज होने के बावजूद, अब तक केवल एक गवाह की ही गवाही हुई।
कोर्ट ने कहा,
"मौजूदा मामले में FIR जून 2019 की और अभी भी मुकदमे में केवल एक गवाह की ही गवाही हुई; यह अभियोजन पक्ष के कामकाज के बारे में बहुत कुछ कहता है।"
कोर्ट ने नासिक के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे उन परिस्थितियों का विस्तार से स्पष्टीकरण दें, जिनके तहत मुकदमा आगे नहीं बढ़ पाया। साथ ही इस देरी के संबंध में प्रत्येक आरोपी की भूमिका का भी उल्लेख करें।
कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल 2026 के लिए तय की।
बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर महाराष्ट्र में मुकदमों में होने वाली देरी पर चिंता जताई है। कोर्ट ने राज्य की आपराधिक अदालतों की स्थिति को "चौंकाने वाली स्थिति" बताते हुए टिप्पणी की कि सैकड़ों मामले आरोप तय होने के चरण पर ही लंबित हैं, जिनमें से कुछ तो 2006 से ही लंबित हैं।
कोर्ट ने एक ऐसे मामले में भी अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की, जिसमें एक विचाराधीन कैदी बिना आरोप तय हुए ही चार साल तक हिरासत में रहा; इस मामले में कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी किए कि आरोपियों को पेश न किए जाने के कारण मुकदमों में देरी न हो।
कोर्ट ने इससे पहले भी MCOCA और UAPA जैसे विशेष कानूनों के तहत होने वाले मुकदमों में देरी की ओर इशारा किया। इसके साथ ही ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष अदालतों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
Case Title – Parmendra @ Gauravsing Rajendra Sinha v. State of Maharashtra