सुप्रीम कोर्ट ने 1979 के मर्डर केस में 3 लोगों को बरी किया, अभियोजन पक्ष की कमियों का ज़िक्र किया

Update: 2026-07-16 04:32 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के 1977 के एक मर्डर केस में दोषी ठहराए गए तीन लोगों को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि वे दोषी थे। कोर्ट को अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर कमियां मिलीं, जैसे कि FIR को मजिस्ट्रेट तक भेजने में बिना वजह देरी, FIR दर्ज करने में विसंगतियां और ऐसे हालात जिनसे कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी पर शक पैदा होता है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सूबेदार, हीरा लाल और राज बक्स की अपील को मंज़ूरी दी और ट्रायल कोर्ट व इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द किया। इन कोर्ट्स ने उन्हें IPC की धारा 148 और 302 (धारा 149 के साथ) के तहत दोषी ठहराया था। दो अन्य आरोपियों के खिलाफ अपीलें पहले ही उनकी मौत के कारण खत्म हो गई थीं। एक आरोपी की मौत हाई कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई।

यह मामला 28 जून 1977 को गोंडा ज़िले में हरिहर सरन की हत्या से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक पर मवेशियों के मेले से लौटते समय भाले, लाठी और अन्य हथियारों से लैस छह आरोपियों ने हमला किया था। ट्रायल कोर्ट ने 1981 में आरोपियों को दोषी ठहराया था और हाई कोर्ट ने 2011 में इस सज़ा को बरकरार रखा था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट को कई ऐसी बातें मिलीं जिनसे अभियोजन पक्ष के दावे कमज़ोर पड़ गए।

कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि घटना के दिन शाम 7.10 बजे FIR दर्ज कराई गई, लेकिन मृतक का शव पूरी रात घटनास्थल पर ही पड़ा रहा और न तो पुलिस और न ही परिवार ने उसे सुरक्षित किया। कोर्ट को इस बात का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला कि घटना के लगभग दो दिन बाद, 30 जून को ही पोस्टमार्टम क्यों किया गया।

बेंच ने यह भी देखा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने इस बारे में अलग-अलग बातें कहीं कि FIR दर्ज कराने के लिए शिकायतकर्ता के साथ पुलिस स्टेशन कौन गया। जहां शिकायतकर्ता का दावा था कि उसके साथ केवल एक गवाह गया था, वहीं जनरल डायरी में दो अन्य रिश्तेदारों की मौजूदगी दर्ज थी। कोर्ट के अनुसार, इस विसंगति ने "अभियोजन पक्ष के मामले की बुनियाद पर ही चोट की।"

FIR में देरी

एक और अहम बात FIR के अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में हुई देरी थी। हालांकि, FIR कथित तौर पर 28 जून को दर्ज की गई, लेकिन यह मजिस्ट्रेट के पास 30 जून को ही पहुँची। कोर्ट ने कहा कि भले ही सिर्फ़ देरी ही केस को ख़राब नहीं करती, लेकिन यह तब अहम हो जाती है जब आस-पास के हालात से पता चले कि FIR का समय या अभियोजन पक्ष की कहानी में हेर-फेर की संभावना है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के दोषी ठहराने वाला फ़ैसला रद्द करते हुए कहा,

"FIR को मजिस्ट्रेट तक भेजने में सिर्फ़ देरी होने से अभियोजन पक्ष का केस कमज़ोर नहीं हो जाता... लेकिन, जब समय या तारीख़ बदलने और मनगढ़ंत कहानी बनाने के आरोप सिर्फ़ अटकलें न हों, बल्कि रिकॉर्ड में मौजूद हालात से उन्हें ठोस आधार मिले। साथ ही आस-पास के तथ्यों से जाँच की निष्पक्षता और ईमानदारी पर असली शक पैदा हो तो ऐसी देरी काफ़ी अहम हो जाती है।"

कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के केस की सच्चाई और विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा,

"FIR का समय बदला गया और बाद में अभियोजन पक्ष की कहानी को इस तरह से गढ़ा गया ताकि घटना स्थल पर कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी दिखाई जा सके।"

कोर्ट ने कहा,

"...हम पाते हैं कि मजिस्ट्रेट को FIR भेजने में हुई देरी कोई अकेली घटना नहीं है। इसके साथ कई बहुत ही असामान्य हालात जुड़े हैं, जैसे कि यह माना गया तथ्य कि मृतक का शव घटना वाली रात भर वहीं पड़ा रहा और परिवार के सदस्यों या पुलिस अधिकारियों ने उसकी गरिमा बनाए रखने की कोई कोशिश नहीं की; जांच की कार्यवाही (इनक्वेस्ट) को अगले दिन के लिए टाल दिया गया; बिना किसी ठोस कारण के लगभग 48 घंटे की देरी के बाद पोस्टमार्टम किया गया; शिकायतकर्ता (PW-1) के साथ पुलिस स्टेशन जाने वाले लोगों के बारे में विरोधाभास; और इन कमियों के लिए कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण न होना।"

यह मामला 28 जून, 1977 को उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के कंचनपुर गाँव के पास एक व्यक्ति की कथित हत्या से जुड़ा है।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि पुलिस स्टेशन के पास होने के बावजूद शव कई घंटों तक बिना किसी देखरेख के कैसे पड़ा रहा। कोर्ट ने इस स्थिति को "चौंकाने वाला और साफ़ तौर पर अजीब" बताया और कहा कि FIR दर्ज होने के बाद भी जांच एजेंसी या पीड़ित के परिवार ने शव को सुरक्षित रखने या संभालने की कोई कोशिश नहीं की।

कोर्ट ने कहा,

"...इसका कोई ठोस कारण समझ नहीं आता कि घटना की सूचना 28 जून, 1977 को ही मिल गई, फिर भी शव का पोस्टमार्टम कराने में लगभग 48 घंटे क्यों लग गए। अभियोजन पक्ष की ओर से इतनी देरी का कोई वाजिब कारण नहीं बताया गया है। इस बात को जब इस अजीब स्थिति के साथ देखा जाता है कि शव पूरी रात बिना किसी देखरेख के पड़ा रहा, तो बचाव पक्ष की इस दलील को काफी बल मिलता है कि घटना के समय के बारे में अभियोजन पक्ष का बयान संदेह से परे नहीं है।"

कोर्ट ने कहा कि हालांकि FIR दर्ज करने में देरी हमेशा अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करती, लेकिन कुछ अजीब स्थितियों में यह महत्वपूर्ण हो जाती है।

कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

"इन सभी स्थितियों को एक साथ देखने पर पता चलता है कि ये केवल प्रक्रियात्मक कमियां नहीं हैं, बल्कि गंभीर खामियां हैं, जो अभियोजन पक्ष के मामले की शुरुआत और विश्वसनीयता पर असर डालती हैं। ये अभियोजन पक्ष के बयान पर बड़ा सवालिया निशान लगाती हैं और बचाव पक्ष की दलील को न केवल विश्वसनीय, बल्कि काफी हद तक संभावित बनाती हैं।"

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर चश्मदीदों ने सच में हत्या देखी होती और पुलिस को कुछ ही घंटों में सूचना दे दी गई होती तो पीड़ित का शव रात भर घटनास्थल पर लावारिस हालत में पड़े रहने का कोई कारण नहीं बनता।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चश्मदीदों, ग्रामीणों, परिवार के सदस्यों और जांच अधिकारियों का व्यवहार सामान्य मानवीय व्यवहार और जांच के स्वीकृत तरीकों के बिल्कुल विपरीत है।

कोर्ट ने घटनास्थल से दो साइकिलें बरामद होने के अभियोजन पक्ष के दावे को भी खारिज किया और कहा कि उनके मालिकाना हक या किसी खास आरोपी से उनके संबंध को साबित करने वाला कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिला।

कोर्ट ने कहा,

"हमारी राय में ऐसी बरामदगी की थ्योरी पूरी तरह से कमजोर है," क्योंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि छह आरोपियों में से किसकी वे साइकिलें थीं या किसके पास वे हैं। बेंच ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि घटना उसी तरह हुई जैसा आरोप लगाया गया। इसलिए बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि घटना स्थल पर चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी "न केवल संदिग्ध, बल्कि बहुत ही असंभव" है।

कोर्ट ने कहा,

"एक बार जब कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी और घटना की शुरुआत व समय के बारे में अभियोजन पक्ष के दावे की सच्चाई पर उचित संदेह पैदा हो जाता है, तो अभियोजन पक्ष के मामले का मूल आधार ही कमजोर पड़ जाता है।"

इसके अनुसार, कोर्ट ने जीवित अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया। चूंकि यह बरी करने का फैसला अभियोजन पक्ष द्वारा अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित न कर पाने पर आधारित था, इसलिए बेंच ने अपीलकर्ताओं में से एक की ओर से उठाए गए नाबालिग होने के तर्क पर विचार करना अनावश्यक समझा।

Cause title: Deo Prasad and Another v. State of Uttar Pradesh

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