[छात्र बनाम यूजीसी] सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता की दलील, विश्वविद्यालय परीक्षा कराए बिना डिग्री देने का फैसला नहीं ले सकते

Update: 2020-08-18 12:11 GMT

यूनिवर्स‌िटी यूजीसी दिशानिर्देशों के तहत समय सीमा के विस्तार की मांग कर सकती हैं, लेकिन वे परीक्षा कराए बिना डिग्री देने का फैसला नहीं ले सकती हैं। यूजीसी की ओर से पेश सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह दलील दी। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट उन या‌चिकाओं के एक बैच पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें यूजीसी के 30 सितंबर तक अंतिम वर्ष की परीक्षाओं करा लेने के दिशानिर्देशों को चुनौती दी गई है।

सॉलिसिटर-जनरल ने जस्टिस अशोक भूषण, आर सुभाष रेड्डी और एमआर शाह की पीठ के समक्ष मामले में अपनी प्रस्तुतिया दीं। उन्होंने खंडपीठ के समक्ष दी गई दलीलें में कहा कि दिशानिर्देशों को रद्द करना सुप्रीम कोर्ट के अध‌िकार क्षेत्र के दायरे में हैं, बेंच को पहले यह तय करना कि क्या केंद्र राज्य को अधिक्रमित कर देगा।

उन्होंने कहा कि वह केंद्र बनाम राज्य का विवाद नहीं खड़ा करना चाहते हैं। उन्होंने बेंच से यूजीसी अधिनियम और यूजीसी की शक्तियों को पढ़ने का अनुरोध किया। सॉलिसिटर-जनरल ने परीक्षा कराने के मामले में महाराष्ट्र सरकार की कालाबाजियों की चर्चा की, जिसने पहले परीक्षा कराने का फैसला किया और फिर कराने का विरोध किया।

उन्होंने कहा, "6 मई को, महाराष्ट्र सरकार ने उच्च और तकनीकी शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक राज्य-स्तरीय समिति का गठन किया। इस समिति ने परीक्षा आयोजित करने की सिफारिश की और राज्य ने उनकी रिपोर्ट स्वीकार कर ली।"

सॉलिसिटर-जनरल ने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी और श्याम दीवान की ओर से पिछली सुनवाई में दी गई दलीलों का का पलटवार पेश किया और कहा कि परीक्षा आयोजित करने का फैसला किसी भी तरह से मनमाना नहीं है और अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए।

यूजीसी द्वारा (30 अप्रैल और 6 जुलाई) को जारी दिशानिर्देशों का उल्‍लेख करते हुए सॉलिसिटर-जनरल ने कहा कि पहले के दिशानिर्देश अनिवार्य नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान में कई विश्वविद्यालय ऑनलाइन, ऑफलाइन और हाइब्रिड मोड में, परीक्षा आयोजित कर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय को परीक्षाओं के सुचारू संचालन का उदाहरण पेश किया।

सॉलिसिटर-जनरल ने अंतिम वर्ष की परीक्षाओं के महत्व पर जोर देते हुए कहा, "परीक्षा में प्रदर्शन छात्रवृत्ति और पहचान के साथ-साथ नौकरी के अवसरों को भी पैदा करता है।"

सॉलिसिटर-जनरल ने कहा कि 6 जुलाई के दिशानिर्देशों से पहले यूजीसी ने जमीनी हकीकत का आकलन किया था और गहनतापूर्वक विचार किया था।

उन्होंने कहा कि 30 सितंबर तक परीक्षा आयोजित करने का निर्णय यह सुनिश्चित करने के लिए लिया गया था कि छात्रों को विदेशी विश्वविद्यालयों या उच्च शिक्षण संस्‍थानों में प्रवेश से पहले ‌डिग्री प्रदान की जा सके; यह छात्रों के हित में था।

सॉलिसिटर-जनरल ने कहा कि जारी किए गए दिशानिर्देशों ने भारत के संविधान की अनुसूची 7 की सूची I की प्रविष्टि 66 से अपनी शक्ति प्राप्त की। उन्होंने 2003 के विनियमों के 6 (1) की ओर खंडपीठ का ध्यान आकर्षित किया, जिसने यह निर्धारित किया गया है कि पहली डिग्री प्रदान करने से पहले विश्वविद्यालय द्वारा एक न्यूनतम मानक का पालन किया जाना चाहिए।

इसलिए, यह तर्क दिया गया कि दिशानिर्देशों में एक वैधानिक अनिवार्य शक्ति थी। उक्त दलील को यशपाल सिंह के 2005 के फैसले और महा वैष्णो देवी महिला विश्व विद्यालय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के 2013 के फैसले से सहारा दिया गया।

खंडपीठ ने सॉलिसिटर-जनरल को बतया कि कि केवल एक ही प्रश्न का उत्तर देने की आवश्यकता थी कि क्या राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत विश्वविद्यालय का निर्णय यूजीसी दिशानिर्देशों को रद्द कर सकता है।

सॉलिसिटर-जनरल ने कहा कि केंद्र सरकार सर्वोच्च रहेगी, जिस पर खंडपीठ ने कहा कि प्रावधानों का एक सामंजस्य होना चाहिए और अगर राज्य में एक निश्चित स्थिति परीक्षाओं के संचालन को बाधित करेगी, तो यूजीसी राज्य को कैसे अध्यायरोहित कर सकता है और भी परीक्षा आयोजित करने का आदेश दे सकता है।

सॉलिसिटर-जनरल ने इस सवाल के जवाब में कहा कि ऐसे मामलों में, राज्य केंद्र से संपर्क कर सकता है और समय सीमा को आगे बढ़ाने का अनुरोध कर सकता है। हालांकि, वह परीक्षा के बिना डिग्री प्रदान करने का निर्णय नहीं ले सकता है। इसके अतिरिक्त, 30 सितंबर की समय सीमा केवल छात्रों के हित में तैयार की गई थी; यह डिक्टेट नहीं था।

सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में निर्णय सुरक्षित रखा लिया है। सभी अध‌िवक्ताओं को तीन दिनों के भीतर अपने प्रस्तुत‌ियों पर एक संक्षिप्त नोट जमा करने का निर्देश दिया है।

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