SIR | नागरिकता का सत्यापन केवल निर्वाचन उद्देश्यों के लिए, प्रक्रिया 'उदार और सॉफ्ट-टच': सुप्रीम कोर्ट को ECI की जानकारी
देश के विभिन्न राज्यों में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट किया कि मतदाताओं की नागरिकता का सत्यापन केवल निर्वाचन उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, न कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने या निर्वासन (deportation) की मंशा से। आयोग ने कहा कि यह प्रक्रिया “उदार और सॉफ्ट-टच” नीति पर आधारित है और इसमें किसी तरह की कठोर या गहन जांच नहीं की जा रही।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ के समक्ष निर्वाचन आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं द्वारा लाल बाबू हुसैन (1995) के फैसले पर भरोसा करना सही नहीं है, क्योंकि उस मामले की परिस्थितियां वर्तमान SIR प्रक्रिया से बिल्कुल अलग थीं। उन्होंने कहा कि लाल बाबू हुसैन के मामले में SIR पहले ही हो चुका था, पुलिस शामिल थी और नागरिकता को लेकर कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं थी, जबकि वर्तमान प्रक्रिया निर्वाचन आयोग स्वयं कर रहा है, बिना पुलिस हस्तक्षेप के।
द्विवेदी ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR अधिसूचना के निर्देश संख्या-3 के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का नाम पहले की मतदाता सूची में मौजूद है, तो उसे पर्याप्त प्रमाणिक मूल्य (probative value) दिया जाता है। आयोग ने बताया कि:
जून 2025 तक के सभी मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म भेजे गए हैं,
2002 की मतदाता सूची में शामिल व्यक्तियों को विशेष महत्व दिया जा रहा है,
माता-पिता से लिंक स्थापित करने का अवसर दिया जा रहा है,
और यदि यह संभव न हो, तो अधिसूचना में बताए गए अन्य 11 दस्तावेजों (जैसे आधार कार्ड) के माध्यम से भी सत्यापन किया जा सकता है।
अनुच्छेद 326 और मताधिकार पर आयोग का पक्ष:
निर्वाचन आयोग ने कहा कि मताधिकार केवल 18 वर्ष की आयु तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 326 के तहत तीन शर्तें हैं—(i) भारतीय नागरिक होना, (ii) 18 वर्ष से अधिक आयु, और (iii) कानून द्वारा अयोग्य न ठहराया जाना व मतदाता के रूप में पंजीकरण। इसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 और मजबूत बनाती है। आयोग के अनुसार, यदि नागरिकता पर संदेह है, तो उसे निर्वाचन के सीमित उद्देश्य से जांचना संवैधानिक दायित्व है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा कि विवाद इस बात का नहीं है कि गैर-नागरिक वोट दें, बल्कि यह प्रश्न है कि नागरिकता का निर्धारण कौन करेगा। इस पर द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि ECI नागरिकता का निर्धारण केवल मतदाता पंजीकरण के लिए करता है, इसके कोई अन्य परिणाम नहीं होते—न निर्वासन, न निवास अवधि का निर्धारण।
नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि SIR के मानदंड जन्म से नागरिकता के नियमों के अनुरूप हैं और जांच न्यायिक जांच जैसी नहीं, बल्कि सरल और व्यावहारिक है।
'वंचितकरण' नहीं, संवैधानिक समावेशन-बहिष्करण:
ECI ने इस धारणा को खारिज किया कि SIR मतदाताओं को वंचित कर रहा है। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची बनाते समय मृत्यु, प्रवासन आदि के कारण बहिष्करण स्वाभाविक है और इसका उद्देश्य लोकतंत्र को शुद्ध व मजबूत करना है। आयोग ने यह भी कहा कि लाखों मतदाताओं में से किसी आम मतदाता ने व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी है; अधिकतर याचिकाएं राजनीतिक दलों या संगठनों द्वारा दायर हैं।
राजनीतिक दलों से सहयोग की अपील:
निर्वाचन आयोग ने जोर दिया कि राजनीतिक दलों को SIR पर सवाल उठाने के बजाय सहयोग करना चाहिए और मतदाताओं के पंजीकरण में मदद करनी चाहिए। इस पर पीठ ने भी टिप्पणी की कि मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करना राजनीतिक दलों का प्रमुख एजेंडा होना चाहिए।
सुनवाई जारी है।