फ़ैसले में यह नहीं कहा गया कि चुनाव आयुक्तों पर कानून किसी खास तरीके से ही बनाया जाना चाहिए: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने के आधार पर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में दिया गया फ़ैसला सिर्फ़ तब तक के लिए एक खाली जगह भरने के लिए था, जब तक संसद कोई कानून नहीं बना लेती; इस फ़ैसले में ऐसे किसी कानून के लिए कोई खास ढांचा तय नहीं किया गया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा,
"अनूप बरनवाल फ़ैसला सिर्फ़ तब तक के लिए खाली जगह भरने के लिए था, जब तक कानून नहीं बन जाता। फ़ैसले में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है कि कानून किसी खास तरीके से ही बनाया जाना चाहिए। आप सिर्फ़ इस आधार पर चुनौती न दें कि अनूप बरनवाल मामले में 5 जजों के फ़ैसले का उल्लंघन हुआ है।"
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें उस कानून को चुनौती दी गई, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होंगे।
जस्टिस दत्ता ने याचिकाकर्ता जया ठाकुर की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया से कहा कि वे सिर्फ़ इस आधार पर निर्भर न रहें कि यह कानून अनूप बरनवाल मामले में 5 जजों की बेंच के फ़ैसले का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि फ़ैसले में यह कहीं नहीं कहा गया था कि संसद को कानून किसी खास तरीके से ही बनाना चाहिए।
हंसारिया ने जवाब दिया कि उनकी चुनौती फ़ैसले में बताए गए संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित है, खासकर एक स्वतंत्र चुनाव आयोग की ज़रूरत पर। उन्होंने दलील दी कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए एक ऐसी संस्था की ज़रूरत होती है जो कार्यपालिका के नियंत्रण से पूरी तरह आज़ाद हो।
जस्टिस दत्ता ने याचिका में दी गई दलीलों पर असंतोष ज़ाहिर करते हुए कहा कि याचिका में विवादित कानून की धारा 7 और 8 के अमान्य होने के बारे में कोई ठोस बात नहीं कही गई।
हंसारिया ने समझाया,
"मैं उस संवैधानिक सिद्धांत के आधार पर चुनौती दे रहा हूं, जिसे अनूप बरनवाल मामले में कोर्ट ने तय किया और जिसका सारांश दिया। संवैधानिक ज़रूरत एक स्वतंत्र चुनाव आयोग की है।"
एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट शदान फ़रासात ने कहा कि जब यह कानून पास किया गया, तब विपक्ष के कई सांसदों को निलंबित किया गया, जिसके चलते इस पर कोई ठीक से बहस नहीं हो पाई। याचिकाकर्ता 'एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स' की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण ने भी याचिका में दी गई उन दलीलों का ज़िक्र किया, जिनमें कहा गया कि यह कानून बिना किसी सार्थक बहस के और सिर्फ़ ध्वनि मत से पास कर दिया गया।
हालांकि, जस्टिस दत्ता ने ADR याचिका के सत्यापन में कुछ कमियों की ओर इशारा किया और निर्देश दिया कि उन्हें ठीक किया जाए। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण मामले में ऐसी चूकों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
बहस के दौरान, हंसारिया ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि न्यायपालिका की। उन्होंने दलील दी कि न्यायिक नियुक्तियों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत ही चुनाव आयोग पर भी लागू होने चाहिए।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि CEC ज्ञानेश कुमार और EC डॉ. सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियां बहुत जल्दबाज़ी में की गईं—सिफारिश के एक ही दिन के भीतर—और विपक्ष के नेता को अनुशंसित उम्मीदवारों की जाँच-पड़ताल करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा कि संबंधित बैठक को पहले ही कर लिया गया, क्योंकि केंद्र सरकार को पता था कि अगले दिन कोर्ट याचिकाकर्ताओं की, इस कानून के खिलाफ दायर स्टे एप्लीकेशन पर सुनवाई करने वाला है। उन्होंने तर्क दिया कि इतनी तेज़ी दिखाना, कार्यपालिका के अत्यधिक नियंत्रण को दर्शाता है।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि किसी मकसद के आरोपों को तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक कोई ऐसा ठोस सबूत न हो, जिससे यह साबित हो कि केंद्र सरकार को पता था कि याचिकाकर्ता के मामले की सुनवाई 15 मार्च को होगी और उन्होंने उसी के अनुसार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
हंसारिया ने स्पष्ट किया कि वह व्यक्तिगत नियुक्तियों को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि खुद इस कानून की वैधता (vires) को चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू की नियुक्ति का ज़िक्र केवल यह दिखाने के लिए किया था कि जब कार्यपालिका का वर्चस्व होता है तो प्रक्रिया किस तरह काम करती है।
हंसारिया ने आगे बताया कि कई कानूनों में—जैसे कि स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, कॉम्पिटिशन एक्ट, लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, और कंपनी एक्ट में—चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) या अन्य गैर-कार्यकारी प्राधिकरण चयन समिति का हिस्सा होते हैं।
वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यह कानून नियुक्तियों पर कार्यपालिका के वर्चस्व को फिर से स्थापित करता है। साथ ही स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों से जुड़े उन संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जो संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि भले ही 'अनूप बरनवाल' फ़ैसला मौजूद न होता, तब भी यही तर्क लागू होते।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नियुक्तियों पर कार्यपालिका का नियंत्रण, अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले अधिकारों को प्रभावित करता है। यहां तक कि कोई संवैधानिक संशोधन भी इस विवादित कानून को वैध नहीं बना सकता, क्योंकि ऐसा कोई भी संवैधानिक संशोधन संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करेगा।
भूषण ने तर्क दिया कि स्वतंत्रता केवल 'महाभियोग' (Impeachment) के ज़रिए पद से हटाने का प्रावधान कर देने से ही सुनिश्चित नहीं हो जाती; बल्कि, नियुक्ति की प्रक्रिया भी उस पक्ष के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त होनी चाहिए, जो चुनावों में एक प्रत्यक्ष हितधारक (Stakeholder) हो। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी दल ही चुनावों में मुख्य दावेदार होता है और उसे नियुक्ति की प्रक्रिया पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
उन्होंने कहा,
"मैं संविधान पीठ के ऐसे पांच फ़ैसलों का हवाला दे रहा हूं, जिनमें यह कहा गया कि सभी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निकायों का स्वतंत्र होना अनिवार्य है। सरकार ने बार-बार ऐसे नियम लाने की कोशिश की, जिन्हें कोर्ट ने बार-बार रद्द कर दिया। स्वतंत्रता केवल इस बात से सुनिश्चित नहीं होती कि किसी को पद से केवल महाभियोग के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि नियुक्ति की प्रक्रिया पर किसी ऐसे पक्ष का वर्चस्व या नियंत्रण न हो, जो खुद विवादों में एक पक्षकार हो।"
उन्होंने यह तर्क भी दिया कि यदि इस कानून को रद्द कर दिया जाता है तो इसके तहत की गई नियुक्तियां भी वैध नहीं रहेंगी—जब तक कि उन्हें 'भावी प्रभाव से रद्द करने' (prospective overruling) संबंधी किसी विशेष निर्देश के तहत सुरक्षा प्रदान न की गई हो। PUCL की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट संजय पारिख ने दलील दी कि अगर ECI में आज़ादी की कमी होगी तो यह अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन होगा, क्योंकि वोटरों के अधिकार एक निष्पक्ष और बिना किसी भेदभाव वाली चुनावी प्रक्रिया पर निर्भर करते हैं।
उन्होंने कहा कि अनूप बरनवाल मामले में अनुच्छेद 324 की व्याख्या इन्हीं संवैधानिक गारंटियों पर आधारित थी। कोई भी ऐसा कानून जो इस आज़ादी को कमज़ोर करता है, वह सीधे तौर पर इन अधिकारों पर असर डालेगा।
सीनियर एडवोकेट शदान फरासात ने दलील दी कि अनूप बरनवाल फैसले में एक अहम नियम तय किया गया कि चुनाव प्रक्रिया पर कार्यपालिका का दबदबा नहीं होना चाहिए, जबकि CJI को कुछ समय के लिए शामिल करना, तब तक के लिए सिर्फ़ एक प्रक्रियागत इंतज़ाम था, जब तक कि कोई कानून नहीं बन जाता। उन्होंने कहा कि एक बार जब यह अहम नियम तय हो जाता है तो संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो उस संवैधानिक दायरे से नीचे हो।
फरासात ने सुझाव दिया कि आज़ादी को पक्का करने के लिए कई दूसरे तरीके अपनाए जा सकते हैं; जैसे कि चुनाव समिति में सभी की सहमति ज़रूरी हो, जिसमें CJI, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच आम राय बनाने में मदद करें; या फिर संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में दो-तिहाई बहुमत से किसी तीसरे सदस्य को चुना जाए; या फिर समिति में सिर्फ़ प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता ही हों और दोनों की सहमति ज़रूरी हो। उन्होंने दलील दी कि ये सभी तरीके कार्यपालिका के दबदबे को रोकते हैं, जबकि जिस कानून को चुनौती दी गई, वह ऐसा नहीं करता।
इस मामले पर सुनवाई अगले हफ़्ते भी जारी रहेगी।
Case Title - Dr. Jaya Thakur v. Union of India and connected cases