Sabarimala Reference | रिट में किसी फ़ैसले को चुनौती कैसे दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा प्रथा के ख़िलाफ़ याचिका पर उठाए सवाल
सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए। यह याचिका दाऊदी बोहरा समुदाय में 'बहिष्कार' (Excommunication) की प्रथा को चुनौती देने के लिए दायर की गई।
यह देखते हुए कि यह रिट याचिका असल में 1962 के फ़ैसले 'सरदार सैयदना ताहेर सैफ़ुद्दीन साहब बनाम बॉम्बे राज्य' को चुनौती दे रही है, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने पूछा कि किसी फ़ैसले को चुनौती देने के लिए रिट याचिका कैसे दायर की जा सकती है।
1962 के उस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने समुदाय के प्रमुख द्वारा दायर एक रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए 'बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ़ एक्स-कम्युनिकेशन एक्ट' रद्द किया था।
1986 में 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी' ने रिट याचिका दायर की, जिसमें 1962 के फ़ैसले पर फिर से विचार करने की मांग की गई। यह याचिका लगभग तीन दशकों तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित रही, जब तक कि 2023 में पांच जजों की एक पीठ ने इसे सबरीमाला मामले में नौ जजों की पीठ के साथ सुनने के लिए भेज दिया। पांच जजों की पीठ ने 1962 के फ़ैसले के संबंध में कुछ शुरुआती (Prima Facie) संदेह भी व्यक्त किए, उस फ़ैसले में धार्मिक प्रमुख की, सदस्यों को समुदाय से बाहर निकालने की शक्तियों को सही ठहराया गया।
नौ जजों की पीठ के सामने बुधवार को सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल (जो रिट याचिका में प्रतिवादी दाऊदी बोहरा समुदाय के सैयदना की ओर से पेश हुए) ने इस रिट याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए।
इस मुक़दमेबाज़ी का इतिहास बताते हुए उन्होंने कहा:
"हम यहां तक कैसे पहुंचे? बात 1962 के उस मूल फ़ैसले से शुरू होती है, जिसमें महाराष्ट्र के क़ानून को चुनौती दी गई [और उसे रद्द कर दिया गया]। फिर 1986 में एक रिट याचिका आई, जिसने उस संविधान पीठ के फ़ैसले को चुनौती दी। पहले सात जजों की एक पीठ बनी, जिस पर हमने आपत्ति जताई। इसके बाद पांच जजों की पीठ का गठन किया गया। पांच जजों की पीठ ने एक संदर्भ (Reference) भेजते हुए कहा कि इस मामले के तीसरे और चौथे बिंदु का सीधा संबंध है, क्योंकि इसमें अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों के संतुलन का सवाल है। यह भी कि क्या संवैधानिक नैतिकता और सार्वजनिक नैतिकता आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुईं।"
इसके बाद जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि क्या 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) के सिद्धांत, अदालत को किसी फ़ैसले की सत्यता या सही होने की जांच करने से नहीं रोकेंगे? उन्होंने कहा कि किसी कोर्ट से यह नहीं कहा जा सकता कि वह रिट अधिकार क्षेत्र में अपने ही फ़ैसलों की समीक्षा करे।
उन्होंने कहा कि हाल ही में एक NGO ने एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें संविधान पीठ के 2014 के फ़ैसले को चुनौती दी गई। उस फ़ैसले में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को 'बच्चों के मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009' से छूट देने के फ़ैसले को सही ठहराया गया।
उन्होंने टिप्पणी की कि कोर्ट ने सीधे तौर पर 1 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाना उचित समझा, क्योंकि यह रिट अधिकार क्षेत्र का सबसे घोर दुरुपयोग है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर रिट याचिकाएं इतनी लापरवाही से दायर की जाएंगी तो कोई भी फ़ैसला कभी भी अंतिम नहीं माना जाएगा।
उन्होंने कहा,
"हाल के एक मामले में हमने याचिका खारिज की और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। पांच जजों के 'प्रमाती' फ़ैसले को अनुच्छेद 32 की याचिका में चुनौती दी गई थी। हमने उस आदेश को वापस नहीं लिया। ऐसी प्रथा जारी नहीं रह सकती। फिर तो किसी भी फ़ैसले की कोई अंतिम वैधता नहीं रह जाएगी।"
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर वकील राजू रामचंद्रन ने जवाब दिया कि वह इस मामले पर बहस करेंगे और कोर्ट को यह समझाएंगे कि अनुच्छेद 32 की याचिका क्यों दायर की गई।
हालांकि, वह संतुष्ट नहीं दिखीं और उन्होंने कहा:
"आप इस तरह से काम नहीं चला सकते, बार-बार रिट याचिकाएं दायर करके इस कोर्ट के फ़ैसलों को चुनौती नहीं दे सकते। इससे किसी भी फ़ैसले की कोई अंतिम वैधता नहीं रह जाएगी। 'अंतुले' मामले में, दो जजों ने पांच जजों के फ़ैसले पर सवाल उठाए और 10 प्रश्न पूछे। उस मामले को 7 जजों की पीठ के पास भेजा गया और 5:2 के बहुमत से यह फ़ैसला दिया गया कि वे दो जज सही थे और उन्होंने पांच जजों का फ़ैसला रद्द कर दिया। वह मामला इससे अलग था, जहाँ पक्षकार बार-बार फ़ैसलों को चुनौती देते रहते हैं; इसका अंत कहां है? फिर पिछले फ़ैसलों की क्या स्थिति रह जाती है? उनकी कोई अंतिम वैधता नहीं रह जाती। हम यहां क़ानून के बजाय कार्यप्रणाली (Practice) पर बात कर रहे हैं।"
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) कांत ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कोर्ट को क़ानून के एक सामान्य सिद्धांत के तौर पर यह तय करना होगा कि क्या कोई कोर्ट, अनुच्छेद 32 या 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपने ही किसी फ़ैसले पर दोबारा विचार कर सकता है।
CJI कांत ने कहा:
"यह किसी एक व्यक्तिगत मामले के संदर्भ में नहीं है, बल्कि क़ानून के सामान्य सिद्धांत के तौर पर हम यह जांच करना चाहेंगे कि क्या कोई कोर्ट, अनुच्छेद 32 या 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए समीक्षा या आदेश वापस लेने की शक्ति का प्रयोग करके अपने ही किसी फ़ैसले पर दोबारा विचार करने की स्थिति में है या ऐसा करने के लिए सक्षम है।"
बुधवार को सबरीमाला संदर्भ मामले की सुनवाई का सातवां दिन था।