सबरीमाला मामला: 10–50 उम्र की महिलाओं का प्रवेश परंपरा के खिलाफ— देवस्वम बोर्ड ने कहा, दूसरे अयप्पा मंदिरों में जा सकती हैं

Update: 2026-04-16 06:55 GMT

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले में Travancore Devaswom Board (त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से बाहर रखना “उचित वर्गीकरण” (reasonable classification) के दायरे में आता है।

सीनियर एडवोकेट सिंघवी ने 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष बोर्ड की ओर से यह दलीलें पेश कीं। इस पीठ में चीफ जस्टिस, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।

2018 के फैसले का संदर्भ

गौरतलब है कि वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को Sabarimala Temple (सबरीमाला मंदिर) में प्रवेश की अनुमति दी थी और कहा था कि “भक्ति को लिंग के आधार पर भेदभाव का विषय नहीं बनाया जा सकता।”

'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' की मान्यता पर तर्क

सिंघवी ने दलील दी कि सबरीमाला वह एकमात्र मंदिर है, जहां भगवान अयप्पा को “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” (पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले) के रूप में पूजा जाता है।

उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा के भारत में लगभग 1000 मंदिर हैं, लेकिन केवल सबरीमाला में ही उनकी इस विशेष रूप में पूजा होती है, और यही इस मंदिर की विशिष्ट पहचान है।

'उचित वर्गीकरण' का तर्क

सिंघवी ने कहा कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को बाहर रखना अनुच्छेद 14 के तहत “उचित वर्गीकरण” के सिद्धांत के अनुरूप है, क्योंकि:

10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है

यह प्रतिबंध “महिला होने” के आधार पर नहीं, बल्कि एक विशेष आयु वर्ग पर आधारित है

इस वर्गीकरण का सीधा संबंध मंदिर की परंपरा और देवता की पहचान से है

'999 अन्य मंदिरों' का उल्लेख

सिंघवी ने कहा कि यदि महिलाएं भगवान अयप्पा के दर्शन करना चाहती हैं, तो वे अन्य 999 मंदिरों में जा सकती हैं, जहां कोई प्रतिबंध नहीं है।

हालांकि, इस पर जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “999 मंदिरों के बजाय इसी मंदिर में क्यों जाना चाहती हैं, यह पूछना कानूनी रूप से उचित नहीं हो सकता।”

इस पर सिंघवी ने स्पष्ट किया कि उनका तर्क यह नहीं है कि महिलाएं अन्य मंदिरों में जाएं, बल्कि यह दिखाना है कि “उचित वर्गीकरण” का सिद्धांत यहां लागू होता है

धार्मिक मान्यता पर सवाल नहीं

सिंघवी ने यह भी कहा कि भगवान अयप्पा के “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” होने की धार्मिक मान्यता को जनहित याचिका के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती।

केंद्र सरकार का पक्ष

इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से कहा था कि 2018 का सबरीमाला फैसला कानूनी दृष्टि से पुनर्विचार योग्य है और इसे गलत कानून घोषित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

यह मामला धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि क्या “उचित वर्गीकरण” के आधार पर इस तरह के प्रतिबंध संवैधानिक रूप से वैध हैं या नहीं।

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