सबरीमाला सुनवाई: 'सुधार के नाम पर धर्म को खत्म नहीं कर सकते' – सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Update: 2026-04-29 08:41 GMT

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला संदर्भ मामले की सुनवाई के दसवें दिन बुधवार को 9-जजों की संविधान पीठ ने अहम मौखिक टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि सुधार के नाम पर धर्म को “खोखला” या समाप्त नहीं किया जा सकता और आस्था व अंतरात्मा के मामलों को न्यायिक बहस का विषय नहीं बनाया जा सकता।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंग ने उन दो महिलाओं की ओर से दलीलें रखीं, जिन्होंने 2018 के फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया था। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत व्यक्तियों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों पर प्राथमिकता रखती है।

जयसिंग ने यह भी तर्क दिया कि अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह “हाथ खींच” नहीं सकतीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है। उनके अनुसार, संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और मौलिक अधिकारों की व्याख्या अलग-थलग नहीं की जा सकती। धर्म समय के साथ विकसित होता है और स्थिर नहीं रहता।

इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अनुच्छेद 25(2)(b) सामाजिक सुधार के लिए राज्य को कानून बनाने की अनुमति देता है, लेकिन यह अपने आप में कोई मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने टिप्पणी की, “सुधार के नाम पर धर्म को खोखला मत कीजिए। सदियों से चले आ रहे अनुष्ठानों और परंपराओं को यूं ही नहीं खोला जा सकता।”

जयसिंग ने 'Essential Religious Practice' (आवश्यक धार्मिक प्रथा) परीक्षण को पूरी तरह खत्म करने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि अदालतों को यह देखना होगा कि किसी प्रथा को हटाने से धर्म के मूल स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा।

हालांकि, जस्टिस जे.बी. पारडीवाला सुंदरेश ने कहा कि इस परीक्षण को लागू करते समय अदालतों को अत्यंत सतर्क रहना होगा, जबकि जस्टिस पी.एस. अमनुल्लाह ने चिंता जताई कि ऐसा करने पर अदालतें “धर्मशास्त्री” की भूमिका निभाने लगेंगी।

जस्टिस अमनुल्लाह ने यह भी सवाल उठाया कि जब एक ही धर्म के भीतर अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हों, तो अदालत सही व्याख्या कैसे तय करेगी। उन्होंने कहा कि हर बार न्यायिक हस्तक्षेप की एक सीमा होनी चाहिए, अन्यथा संवैधानिक सुरक्षा “मायावी” लगने लगेगी।

मंदिर प्रवेश के अधिकार पर बहस के दौरान जयसिंग ने कहा कि महिलाओं के प्रवेश से किसी को कानूनी नुकसान नहीं होता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला धार्मिक मान्यता के कारण मंदिर नहीं जाना चाहती, तो वह उसका विकल्प है, लेकिन सभी महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया, “क्या परंपरा चलेगी या एक महिला की इच्छा?”

जयसिंग ने जवाब दिया, “यह इच्छा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का प्रश्न है।”

जस्टिस अमनुल्लाह ने पूछा कि क्या किसी धार्मिक स्थल पर जाकर वहां के लोगों की भावनाओं को आहत करना 'श्रद्धा' कहलाएगा? इस पर जयसिंग ने कहा कि केवल भावनाएं आहत होना कानूनी क्षति नहीं माना जा सकता।

जस्टिस सुंदरेश ने चेतावनी दी कि यदि हर व्यक्ति अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार आचरण करने लगे, तो इससे अव्यवस्था फैल सकती है।

अंत में जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “यह धर्म को समाप्त करने जैसा होगा, जिसका हम हिस्सा नहीं बनना चाहते। अंतरात्मा के मुद्दों पर धर्मनिरपेक्ष अदालत में बहस नहीं हो सकती।”

सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की धार्मिक आधार क्या है। जयसिंग ने दावा किया कि इस परंपरा का कोई ठोस धार्मिक आधार नहीं है।

मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।

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