सबरीमला केस: सॉलिसिटर जनरल ने 'संवैधानिक नैतिकता' पर उठाए सवाल, बोले—ट्रांसफॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म समझ नहीं आया

Update: 2026-04-08 10:35 GMT

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 'परिवर्तनकारी संवैधानिकता' और 'संवैधानिक नैतिकता' जैसे सिद्धांतों के उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 'संवैधानिक नैतिकता' को न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता और यह अवधारणा स्पष्ट नहीं है।

उन्होंने कहा कि वह लंबे समय से 'परिवर्तनकारी संवैधानिकता' के बारे में सुन रहे हैं, लेकिन उनकी समझ में यह सिद्धांत ठीक से नहीं आता।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि वर्तमान कार्यवाही में अदालत सीधे तौर पर 'परिवर्तनकारी संवैधानिकता' पर विचार नहीं कर रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि समाज में नैतिकता स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है।

अनुच्छेद 25 और 'नैतिकता' की व्याख्या

मेहता ने जोर देकर कहा कि Article 25 में प्रयुक्त 'नैतिकता' शब्द का अर्थ 'संवैधानिक नैतिकता' नहीं लगाया जा सकता। उनके अनुसार, 'संवैधानिक नैतिकता' एक अस्पष्ट और व्यक्तिपरक अवधारणा है, जो अलग-अलग न्यायाधीशों के लिए अलग अर्थ रख सकती है। इसलिए इसे धार्मिक प्रथाओं की वैधता जांचने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

जस्टिस जॉयमल्या बागची ने कहा कि अनुच्छेद 25(1) में 'विवेक' (conscience) का विशेष महत्व है। समाज के अलग-अलग वर्गों की नैतिक मान्यताएं अलग हो सकती हैं, और ये सभी एक व्यापक संवैधानिक ढांचे के भीतर सह-अस्तित्व में रह सकती हैं।

 2018 के सबरीमाला और 'जोसेफ शाइन' फैसले पर टिप्पणी

सॉलिसिटर जनरल ने 2018 के सबरीमाला फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि उसमें 'संवैधानिक नैतिकता' को आधार बनाना गलत था। उनके अनुसार, यह एक अस्पष्ट शब्द है, जिसे 'सामाजिक नैतिकता' के स्थान पर नहीं रखा जा सकता।

उन्होंने Joseph Shine v. Union of India (जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ) मामले पर भी सवाल उठाए, जिसमें व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था। उन्होंने कहा कि इस फैसले में 'संवैधानिक नैतिकता' का उपयोग उचित नहीं था।

हालांकि, चीफ़ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि इस सुनवाई में 'जोसेफ शाइन' मामले के मूल निर्णय (ratio) पर कोई सवाल नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 इसलिए असंवैधानिक घोषित की गई थी क्योंकि वह महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण थी। जस्टिस बागची ने भी इस बात का समर्थन किया।

 पीठ की संरचना

इस 9-न्यायाधीशों की पीठ में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुन्द्रेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमल्या बागची शामिल हैं।

निष्कर्ष

इस सुनवाई में 'संवैधानिक नैतिकता', 'सामाजिक नैतिकता' और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह बड़ी पीठ इन जटिल मुद्दों पर विचार कर रही है, जिसका असर भविष्य के संवैधानिक और धार्मिक मामलों पर पड़ सकता है।

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