'30 करोड़ रुपये का समझौता फेल होने के बाद रेप का केस दर्ज': सुप्रीम कोर्ट ने IT उद्यमी को अग्रिम ज़मानत दी

Update: 2026-04-17 05:24 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल) को रेप और यौन उत्पीड़न के आरोपी एक कारोबारी को अग्रिम ज़मानत दी। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि उसके खिलाफ शिकायत दोनों पक्षकारों के बीच 30 करोड़ रुपये के प्रस्तावित वित्तीय समझौते के फेल होने के बाद दर्ज की गई लगती है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने केरल के IT उद्यमी वेणु गोपालकृष्णन की अपील मंज़ूर की। बेंच ने केरल हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें एर्नाकुलम के इन्फोपार्क पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के सिलसिले में उन्हें अग्रिम ज़मानत देने से इनकार किया गया था।

यह FIR भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5) (साझा इरादा) के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 351(2) (आपराधिक धमकी), 64 (रेप), 74 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना), 75 (यौन उत्पीड़न) और 79 (महिला की गरिमा का अपमान करना) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67A (यौन रूप से स्पष्ट कृत्य प्रसारित करना) के तहत दर्ज की गई।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर आरोपी को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे 1 लाख रुपये की नकद ज़मानत और दो ज़मानतदारों के साथ ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए। यह ज़मानत इस शर्त पर दी गई है कि वह जांच में सहयोग करेगा और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं करेगा।

आपराधिक शिकायतें दर्ज होने से पहले 30 करोड़ रुपये के समझौते की मांग की गई

बेंच ने पाया कि 24 जुलाई, 2025 को आरोपी शिकायतकर्ता और उसके पति के बीच एक बैठक हुई। इस बैठक के दौरान, विवाद को सुलझाने के लिए किस्तों में 30 करोड़ रुपये का भुगतान करने का प्रस्ताव रखा गया।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज़ों से यह संकेत मिलता है कि शिकायतकर्ता और उसके पति विवाद को खत्म करने के लिए यह भुगतान स्वीकार करने को तैयार थे।

कोर्ट ने कहा,

"वे (शिकायतकर्ता और उसके पति) अपने आरोपों को खत्म करने के लिए 30 करोड़ रुपये स्वीकार करने को तैयार थे।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"अगर वित्तीय समझौता अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंच गया होता तो कोई भी आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की गई होती।"

बेंच ने आगे यह भी नोट किया कि अपीलकर्ता ने ज़बरदस्ती वसूली की आशंका में 28 जुलाई, 2025 को शिकायतकर्ता और उसके पति के ख़िलाफ़ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई, जिसके चलते उन्हें गिरफ़्तार किया गया और बाद में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया। इसके बाद ही शिकायतकर्ता ने अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ बलात्कार और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई।

अदालत ने टिप्पणी की कि घटनाओं का क्रम यह संकेत देता है कि बाद वाली FIR, अपीलकर्ता द्वारा शुरू की गई पिछली आपराधिक कार्यवाही के "जवाब" (Counter Blast) के तौर पर दर्ज कराई गई।

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले सितंबर, 2025 में अपीलकर्ता को अंतरिम सुरक्षा प्रदान की और निर्देश दिया कि जांच में सहयोग करने की शर्त पर उसके ख़िलाफ़ कोई भी ज़बरदस्ती वाला कदम न उठाया जाए।

यह देखते हुए कि जांच अभी भी जारी है और मामले की समग्र परिस्थितियों पर विचार करते हुए अदालत ने यह फ़ैसला दिया कि अंतरिम सुरक्षा को स्थायी (Absolute) किया जाना उचित है।

अपील को मंज़ूर करते हुए अदालत ने फ़ैसला दिया कि अपीलकर्ता अग्रिम ज़मानत से संबंधित क़ानून के तहत राहत पाने का हकदार है, और निर्देश दिया कि ज़मानत की शर्तों का किसी भी तरह से उल्लंघन किए जाने पर दी गई सुरक्षा रद्द की जा सकती है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल अग्रिम ज़मानत के प्रश्न तक ही सीमित हैं। इनका मुक़दमे की मेरिट (गुण-दोष) पर, या पक्षों के बीच लंबित किसी अन्य कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

Case : Venu Gopalakrishnan v State of Kerala and another

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