आधार एनरोलमेंट सिर्फ़ 6 साल से कम उम्र के बच्चों तक सीमित करने की याचिका: सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से संपर्क करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) को निपटा दिया, जिसमें मांग की गई कि नागरिकों को आधार कार्ड सिर्फ़ 6 साल की उम्र तक ही जारी किए जाएं। इस तय सीमा के बाद उन्हें सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट/तहसीलदार के दफ़्तर से आधार बनवाने की अनुमति दी जाए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने राय दी कि उठाए गए मुद्दे विधायी दायरे में आते हैं। आदेश दिया कि इस रिट याचिका (जो PIL के तौर पर दायर की गई) को संबंधित अधिकारियों के सामने एक अभ्यावेदन (Representation) के तौर पर माना जाए।
संक्षेप में मामला
यह PIL एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की, जिसमें केंद्र सरकार, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को पक्षकार बनाया गया। इसमें UIDAI को निर्देश देने की मांग की गई कि वह नए आधार कार्ड सिर्फ़ बच्चों को ही जारी करे और किशोरों व वयस्कों के लिए सख़्त दिशा-निर्देश बनाए ताकि घुसपैठिए आधार हासिल करके भारतीय नागरिक होने का ढोंग न कर सकें।
इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कमज़ोर सत्यापन प्रक्रिया के कारण, घुसपैठियों के लिए आधार कार्ड हासिल करना आसान हो जाता है। फिर वे इसका इस्तेमाल राशन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, मूल निवास प्रमाण पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस आदि जैसे दस्तावेज़ बनवाने के लिए करते हैं, जिससे असली नागरिकों को नुकसान होता है।
उनका यह भी तर्क था कि मौजूदा व्यवस्था के तहत किसी गांव के प्रधान या नगर पार्षद की सिफ़ारिश पर भी आधार बनवाया जा सकता है। इसका नतीजा यह होता है कि जो घुसपैठिए इसके हक़दार नहीं हैं, वे भी आधार हासिल कर लेते हैं और उन सब्सिडी व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाते हैं जो उनके लिए नहीं हैं।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने इन तर्कों को दोहराते हुए बताया कि UIDAI ने अब तक 144 करोड़ आधार कार्ड जारी किए, जिससे देश की 99% आबादी का एनरोलमेंट हो चुका है। उन्होंने यह भी दावा किया कि 3 दिन पहले ही सिर्फ़ मुंबई से 87,000 जाली दस्तावेज़ बरामद किए गए।
इसके जवाब में CJI कांत ने टिप्पणी की कि पासपोर्ट, क़ानून की डिग्रियां, फ़ार्मा डिग्रियां आदि सहित सभी तरह के दस्तावेज़ों में जालसाज़ी की गुंजाइश रहती है। बेंच ने अंततः याचिकाकर्ता से कहा कि वे अपनी शिकायतें संसद या सरकार के सामने रखें।
अपने आदेश में बेंच ने याचिकाकर्ता के तर्कों को इस प्रकार दर्ज किया:
(i) आधार फ्रेमवर्क में वैधानिक कमी है।
(b) नागरिकों के अधिकारों पर बुरा असर पड़ रहा है।
(c) अवैध आप्रवासन से बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति पैदा हो सकती है।
(d) चुनावी सूचियों में गैर-नागरिकों को शामिल करना संवैधानिक जनादेश से समझौता है।
अंत में यह मानते हुए कि अधिकांश राहतों के लिए विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता है, याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह सभी मुद्दों को राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य हितधारकों के संज्ञान में लाए।
Case Title: Ashwini Kumar Upadhyay v. Union of India and Ors., Diary No.21141/2026