सुप्रीम कोर्ट में इंटरसेक्स लोगों के लिए अलग कानूनी पहचान और सुरक्षा की मांग वाली याचिका

Update: 2026-07-18 04:25 GMT

Same Sex Marriage

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में जन्म से ही जेंडर संबंधी विशेषताओं में अंतर (इंटरसेक्स) वाले लोगों के लिए अलग कानूनी पहचान और सुरक्षा उपायों की मांग की गई।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ता शमश्रविश रेन की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया।

याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। उन्होंने यह PIL दायर की। इसमें मांग की गई कि जन्म से जेंडर संबंधी विशेषताओं में अंतर वाले लोगों को एक अलग और पहचाने जाने योग्य वर्ग माना जाए। यह मांग "खास संवैधानिक सुरक्षा और उचित कानूनी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के सीमित उद्देश्य" के लिए है और इससे ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

उन्होंने केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की कि वे 6 महीने के भीतर जरूरी कानूनी दिशानिर्देश बनाएं और 3 महीने के भीतर इंटरसेक्स देखभाल के लिए एक राष्ट्रीय चिकित्सा प्रोटोकॉल समिति का गठन करें। याचिकाकर्ता ने पूरे देश में इंटरसेक्स शिशुओं और बच्चों पर किसी भी ऐसी सर्जरी या हार्मोनल इलाज पर तुरंत रोक लगाने की भी मांग की, जो मेडिकल रूप से जरूरी नहीं है या जिसे बदला नहीं जा सकता (irreversible), जब तक कि वे अपनी सहमति देने में सक्षम न हो जाएं।

याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट, आधार, शिक्षा, रोजगार और जन्म पंजीकरण दस्तावेजों के नियमों में जरूरी बदलावों के साथ-साथ शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का ढांचा (जैसा कि अन्य संरक्षित वर्गों के लिए उपलब्ध है) बनाने की भी मांग की। एक और मांग यह है कि केंद्र सरकार स्पष्टीकरण वाले उपाय सुझाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इंटरसेक्स लोगों को विरासत और उत्तराधिकार के नियमों से बाहर न रखा जाए।

याचिकाकर्ता का कहना है कि वह कानून के तहत ट्रांसजेंडर लोगों को पहले से मिले अधिकारों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहतीं। बल्कि, वह इंटरसेक्स लोगों के लिए स्वतंत्र सुरक्षा उपाय और जेंडर पहचान में अंतर (gender identity variance) तथा जन्मजात जैविक इंटरसेक्स स्थिति के बीच स्पष्ट अंतर चाहती हैं।

याचिका में कहा गया,

"इंटरसेक्स स्थिति एक जन्मजात जैविक स्थिति है... यह अनोखी मेडिकल, कानूनी और सामाजिक कमजोरियां पैदा करती है। इसके लिए खास संवैधानिक सुरक्षा उपायों की जरूरत है, जो प्रकृति में अलग हों।"

आरोप है कि भारत में इंटरसेक्स लोगों को लगातार बचपन में बिना सहमति के "सामान्य बनाने" (normalization) वाली सर्जरी, सामाजिक बहिष्कार और कलंक, विरासत से बेदखली और व्यवस्थित आरक्षण की कमी का सामना करना पड़ता है।

याचिकाकर्ता इस बात पर जोर देती हैं कि जन्म के समय, अस्पष्ट जननांगों, क्रोमोसोमल पैटर्न या अन्य इंटरसेक्स स्थितियों के कारण इंटरसेक्स लोगों की पहचान न तो स्पष्ट रूप से पुरुष के तौर पर हो पाती है और न ही महिला के तौर पर। याचिकाकर्ता का कहना है कि अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत ऐसे लोगों को अलग कानूनी पहचान और सकारात्मक सहायता व्यवस्था देना ज़रूरी है, ताकि जन्म के समय से ही उनके अधिकारों की सुरक्षा हो सके।

"इंटरसेक्स लोग 'दूसरे' नहीं हैं। वे कोई असामान्यता या विचलन नहीं हैं। वे ऐसे नागरिक हैं जिन्हें पूरी संवैधानिक गरिमा पाने का अधिकार है। पहचान स्पष्ट होनी चाहिए, सुरक्षा विशेष होनी चाहिए और समानता सार्थक होनी चाहिए।"

Case Title: SHAMSHRAVISH REIN Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 764/2026

Tags:    

Similar News