केंद्र सरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी, जिसमें नोएडा के जिला मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था, जिसके तहत दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र को नोएडा में श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इसकी जानकारी दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिरासत का आदेश रद्द करने के साथ छात्र को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह रकम नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम के व्यक्तिगत वेतन से वसूल की जाए। हाईकोर्ट ने हिरासत का आदेश जारी करने के तरीके पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इसमें बिना दिमाग लगाए कार्रवाई की गई और जिला मजिस्ट्रेट का आचरण उपहास के योग्य है।

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस से जुड़ी सुनवाई के दौरान उठा। छात्र के खिलाफ यह नोटिस CJI के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े अभियान को लेकर जारी किया गया था।

सुबह सीनियर एडवोकेट बिश्वजीत भट्टाचार्य ने जब इस कार्रवाई का मौखिक रूप से जिक्र किया तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने इसे गंभीरता से लिया।

उन्होंने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही सीजेआई के विरोध-प्रदर्शन में छात्रों की भागीदारी को लेकर उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तो मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश कैसे जारी कर सकते हैं।

लंच से पहले सुनवाई समाप्त होने के समय सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी मामले का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि नोएडा के जिला मजिस्ट्रेट से इस मुद्दे पर लगातार मीडिया सवाल किए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कारण बताओ नोटिस नोएडा के जिला मजिस्ट्रेट ने नहीं, बल्कि ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने जारी किया।

इसी दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें नोएडा डीएम के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत आदेश को रद्द किया गया था।

इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया,

"हम उस आदेश को चुनौती दे रहे हैं।"

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