Manipur Violence : सुप्रीम कोर्ट ने रोज़ाना सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का प्रस्ताव दिया, जांच तेज़ी से पूरी करने पर ज़ोर दिया

Update: 2026-07-24 07:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा से जुड़े आपराधिक मामलों की रोज़ाना सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का प्रस्ताव दिया। कोर्ट ने जांच में हो रही लंबी देरी पर चिंता जताई और इस बात पर ज़ोर दिया कि लंबित जांच को उचित समय के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI), स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीमों (SITs) और महाराष्ट्र के पूर्व DGP दत्तात्रेय पडसलगीकर (जिन्हें कोर्ट ने जांच की निगरानी के लिए नियुक्त किया था) द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट पर गौर किया।

कोर्ट ने नोट किया कि CBI ने 21 मामलों में चार्जशीट दाखिल की, जबकि 11 मामलों में जांच जारी है। तीन मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर ली गई हैं और चार मामले अभी भी जांच के दायरे में हैं। कोर्ट ने यह भी देखा कि आठ ज़िलों में 3,020 मामलों की जांच कर रही SITs ने 301 मामलों में चार्जशीट दाखिल की, जिनमें से केवल 10 मामलों में ही सुनवाई शुरू हुई।

स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, सभी मामलों में कुल 2,924 गवाहों से पूछताछ का प्रस्ताव है।

CBI ने कोर्ट को बताया कि उसे जांच पूरी करने में कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जैसे गवाहों का दूसरी जगह जाना, अविश्वास के कारण सहयोग न मिलना, भाषा की बाधाएं और राज्य में लंबे समय तक इंटरनेट सेवाएं बंद रहने के कारण डिजिटल सबूत इकट्ठा करने में मुश्किलें।

इन मुश्किलों पर ध्यान देते हुए बेंच ने कहा:

"यह सच हो सकता है कि बताई गई चुनौतियों के कारण उन्हें जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो। फिर भी लंबित जांच को उचित समय के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।"

इसके बाद कोर्ट ने संकेत दिया कि वह मणिपुर राज्य और मणिपुर व गुवाहाटी हाईकोर्ट के साथ सलाह-मशविरा करके स्पेशल कोर्ट बनाने पर विचार कर रहा है ताकि मामलों की सुनवाई रोज़ाना हो सके।

कोर्ट ने कहा,

"हम मणिपुर राज्य और मणिपुर व गुवाहाटी हाई कोर्ट की सहमति से स्पेशल कोर्ट बनाने का शुरुआती प्रस्ताव दे रहे हैं ताकि मामलों की सुनवाई रोज़ाना हो सके।"

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह तभी संभव होगा, जब CBI और SITs अपनी जांच पूरी करें और तेज़ी से चार्जशीट दाखिल करें। मणिपुर राज्य को जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया गया।

बेंच ने CBI, SIT और कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग ऑफिसर को नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल से उन सभी FIR की जानकारी इकट्ठा करने को कहा जिनमें जांच चल रही है या चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। कोर्ट ने कहा कि इस डेटा से यह तय करने में मदद मिलेगी कि कितने स्पेशल कोर्ट की ज़रूरत है।

एक हफ़्ते के अंदर पीड़ितों को चार्जशीट

कोर्ट ने उन शिकायतों पर भी गौर किया, जिनमें कहा गया कि पहले के निर्देशों के बावजूद पीड़ितों के परिवारों को चार्जशीट की कॉपी नहीं मिली है।

वकील वृंदा ग्रोवर ने बताया कि मारे गए पीड़ितों के परिवारों ने उन्हें जानकारी दी कि उन्हें अभी तक चार्जशीट नहीं मिली है। कोर्ट ने ध्यान दिया कि हालांकि मणिपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने पहले बताया कि कानूनी मदद और चार्जशीट उपलब्ध कराने के लिए सिस्टम बना दिया गया, लेकिन इसका पालन अभी भी अधूरा है।

बेंच ने कानूनी मदद देने वाले वकील को मणिपुर और गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के ऑफिस से तुरंत संपर्क करने का निर्देश दिया। साथ ही अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि संपर्क होने के एक हफ़्ते के अंदर चार्जशीट उपलब्ध करा दी जाए।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने स्पष्ट किया कि कोर्ट के पहले के निर्देश केवल पीड़ितों और उनके वकीलों को चार्जशीट उपलब्ध कराने तक सीमित थे, न कि महिला समूहों या PIL याचिकाकर्ताओं को, क्योंकि ये दस्तावेज़ संवेदनशील आपराधिक कार्यवाही से जुड़े हैं।

लापता लोगों के मामले में याचिका

कोर्ट ने 'इंटरनेशनल मैतेई ऑर्गनाइज़ेशन' की उस अर्ज़ी पर भी विचार किया, जिसमें लगभग 30 लोगों के लापता होने के मामले की CBI जांच की मांग की गई।

दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद बेंच ने याचिकाकर्ताओं को मणिपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से संपर्क करने का निर्देश दिया, जो इस मामले को SIT या किसी अन्य उपयुक्त संस्था को सौंपने पर विचार कर सकते हैं।

पूजा स्थलों का पुनर्निर्माण

ईसाई चर्चों के संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील शाहरुख आलम ने कहा कि हिंसा के दौरान नष्ट हुए कई पूजा स्थलों का अभी तक पुनर्निर्माण नहीं हुआ है और कुछ जगहों पर कथित तौर पर कब्ज़ा किया जा रहा है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अधिकारियों ने विस्थापित लोगों के लिए घर बनाने को सही ढंग से प्राथमिकता दी।

CJI ने कहा,

"लोगों को सिर पर छत की ज़रूरत है। लेकिन किसी भी तरह का कब्ज़ा नहीं होने दिया जाना चाहिए। घर बनने के बाद, वे सार्वजनिक स्थलों के पुनर्निर्माण पर विचार कर सकते हैं।"

जस्टिस बागची ने कहा कि आगे किसी भी तरह के कब्ज़े को तुरंत रोका जाना चाहिए।

बेंच ने याचिकाकर्ताओं को प्रभावित धार्मिक ढांचों का विवरण कोर्ट द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय समिति को सौंपने की अनुमति दी। इसने समिति को दावों की जांच करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जहां भी तोड़े जाने से पहले वैध ढांचे मौजूद थे, उन जगहों को कब्ज़े से बचाया जाए।

तीन सदस्यीय समिति का कार्यकाल दिसंबर तक बढ़ा दिया गया।

सुनवाई के दौरान, सीनियर वकील शादान फरासत ने एक 18 वर्षीय आरोपी के लिए ज़मानत की मांग की, जिस पर कथित तौर पर सिर्फ़ एक घटना के दौरान वीडियो रिकॉर्ड करने का आरोप था। उन्होंने तर्क दिया कि मुख्य आरोपी को पहले ही ज़मानत मिल चुकी है।

बेंच ने ध्यान दिया कि CBI ने मुख्य आरोपी को मिली ज़मानत को चुनौती दी। जब फरासत ने कहा कि कोर्ट ने पहले मौखिक रूप से संकेत दिया था कि वह ज़मानत रद्द करने के पक्ष में नहीं है, तो बेंच ने मामले की सुनवाई सोमवार तक के लिए टाल दी।

Case : CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION v. ARUN KHUNDONGBAM @NANAO | SLP(Crl) No. 5756/2026 and connected cases

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