दी गई अंतिम राहत को निर्णय के औचित्य का स्वाभाविक परिणाम नहीं होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि उसकी ओर से दी गई अंतिम राहत उसके फैसले के औचित्य (ratio decidendi) का प्राकृतिक परिणाम नहीं होना चाहिए।
इस मामले में, एमआरटीपी कमिशन ने कुछ घर खरीदारों (अपीलकर्ताओं) की ओर से धारा 36-ए, 36-बी(ए) और (डी), 36-डी और 36-ई सहपठित धारा 2 (आई) और 2(o) एमआरटीपी एक्ट के तहत दायर एक शिकायत को खारिज कर दिया।
खरीदार बिल्डर द्वारा अतिरिक्त शुल्क की मांग से नाराज थे। उन्होंने कहा, निर्माण शुरू होने के बाद अतिरिक्त शुल्क की मांग कीमतों में हेराफेरी के समान थी, जिसके परिणामस्वरूप लागत में वृद्धि हुई, जिससे खरीदारों को नुकसान हुआ।
हालांकि जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने एमआरटीपी कमिशन के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन बिल्डर को प्रत्येक फ्लैट के लिए अपीलकर्ताओं द्वारा 25,00,000/- रुपये के भुगतान पर उन्हें फ्लैटों का कब्जा सौंपने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा,
"26. यह स्थापित कानून है कि इस न्यायालय द्वारा दी गई अंतिम राहत उसके फैसले के औचित्य का प्राकृतिक परिणाम नहीं होनी चाहिए। हालांकि, हमने न्याय के हित में एमआरटीपी कमिशन के आदेश को बरकरार रखा है।"
पीठ ने इस संबंध में दो फैसलों, संजय सिंह और अन्य बनाम यूपी लोक सेवा आयोग और अन्य (2007) 3 एससीसी 720 और यूपी लोक सेवा आयोग बनाम मनोज कुमार यादव और अन्य (2018) 3 एससीसी 706 पर भरोसा किया।
संजय सिंह मामले में अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट के हर फैसले में तीन खंड होते हैं, यानि (i) मुद्दे के तथ्य और बिंदु; (ii) निर्णय के कारण; और (iii) निर्णय युक्त अंतिम आदेश। आगे यह कहा गया कि निर्णय का औचित्य या ratio decidendi निर्णय में शामिल अंतिम आदेश नहीं है।
केस शीर्षकः बीबी पटेल बनाम डीएलएफ यूनिवर्सल लिमिटेड
सिटेशनः 2022 लाइव लॉ (एससी) 90
केस नंबर/तारीखः CA 1106 of 2009 | 25 जनवरी 2022