पश्चिम बंगाल में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की दलील नहीं दे रहे: ED ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल के I-PAC मामले की सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने स्पष्ट किया कि वह राज्य में संवैधानिक तंत्र के पूर्ण विफल होने की दलील नहीं दे रहा है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि ED का तर्क केवल “कानून के शासन (Rule of Law) के उल्लंघन” तक सीमित है, न कि संवैधानिक तंत्र के टूटने तक।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें ED ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल कर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग की है।
ED का आरोप है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस अधिकारियों ने I-PAC कार्यालय पर छापेमारी के दौरान जांच में बाधा डाली।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि “संवैधानिक तंत्र के विफल होने” जैसी दलील के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि इससे अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति बन सकती है।
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि ED ऐसी कोई दलील नहीं दे रहा और उसका उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि कानून के शासन का उल्लंघन हुआ है, जो अनुच्छेद 14 से जुड़ा है और इसी आधार पर अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की गई है।
ED ने यह भी कहा कि जब मुख्यमंत्री और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्वयं मामले में शामिल हों और राज्य पुलिस ने ED अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर दी हो, तो उससे निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
इसलिए एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच जरूरी है। मामले की सुनवाई जारी है और यह केंद्र और राज्य के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है।