'कानूनी तौर पर मंगाए गए जानवरों को परेशान करना क्रूरता हो सकता है': सुप्रीम कोर्ट ने 'वनतारा' के खिलाफ याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जनहित याचिका (PIL) खारिज की, जिसमें आरोप लगाया गया कि 'वनतारा' द्वारा जानवरों के आयात में अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया गया। कोर्ट ने कहा कि ये मुद्दे पिछले साल ही एक अन्य मामले में खारिज कर दिए गए, जब एक SIT जांच में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने 'करणार्थम विरम फाउंडेशन' द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। इस याचिका में 'लुप्तप्राय वन्यजीवों और वनस्पतियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन' (CITES) के दस्तावेजों का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया कि 'वनतारा' के दो पशु पुनर्वास और कल्याण ट्रस्टों—यानी, 'ग्रीन्स जूलॉजिकल रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर' और 'राधा कृष्ण मंदिर हाथी कल्याण ट्रस्ट'—द्वारा वन्यजीवों के आयात में अनियमितताएं बरती गईं।
याचिकाकर्ता ने कई निर्देश जारी करने की मांग की, जिनमें निजी संस्थाओं को दिए गए आयात/निर्यात लाइसेंस और CITES परमिट से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक करना; CITES नियमों के पालन की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन करना; 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' के तहत कार्रवाई शुरू करना; CITES परमिटों के सत्यापन के लिए एक 'मानक संचालन प्रक्रिया' (SOP) तैयार करना; और निजी सुविधाओं द्वारा कुछ विशेष प्रजातियों के आगे के आयात पर अस्थायी रोक लगाना शामिल था।
कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे की जांच पहले ही 'सीआर जया सुकिन बनाम भारत संघ, 2025 LiveLaw (SC) 913' मामले में की जा चुकी है। उस मामले में कोर्ट द्वारा गठित एक 'विशेष जांच दल' (SIT) ने 'वनतारा' में जानवरों को हासिल करने के मुद्दे पर विस्तृत जांच की थी। SIT की अंतिम रिपोर्ट—जिसे 15 सितंबर, 2025 को स्वीकार कर लिया गया—में पाया गया कि जानवरों को हासिल करने में किसी भी घरेलू या अंतरराष्ट्रीय कानून का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"याचिका का मुख्य विषय, सार रूप में वही है, जो 'W.P.(C) No. 783 of 2025' मामले में विचार का विषय था। उन मामलों की जांच इस कोर्ट द्वारा गठित SIT ने की थी। कोर्ट ने SIT की फाइनल रिपोर्ट को इस कोर्ट ने 15 सितंबर, 2025 को स्वीकार किया था। उस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि किसी भी घरेलू या अंतरराष्ट्रीय कानून का कोई उल्लंघन नहीं पाया गया।"
इसके अलावा, कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि एक बार जब कोई आयात वैध कानूनी अनुमतियों के तहत किया जाता है तो बाद में सिर्फ़ इसलिए उसे प्रतिबंधित नहीं माना जा सकता कि बाद में उस पर आपत्तियां उठाई गईं।
कोर्ट ने कहा,
“एक बार जब कोई आयात वैध अनुमति के तहत कर लिया जाता है, तो बाद में सिर्फ़ इसलिए उसे आयातक के लिए प्रतिबंधित नहीं माना जा सकता कि उसके बाद आपत्तियां उठाई गईं।”
ऐसा कहते हुए कोर्ट ने ईस्ट इंडिया कमर्शियल कंपनी लिमिटेड बनाम कलेक्टर ऑफ़ कस्टम्स, 1962 AIR 1893 मामले का हवाला दिया और यह टिप्पणी की कि प्रशासनिक स्वीकृतियां, एक बार वैध रूप से दिए जाने और उन पर अमल किए जाने के बाद अंतिम रूप ले लेती हैं और उन्हें यूं ही रद्द नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने आगे यह भी चेतावनी दी कि ऐसे वैध आयातों में दखल देना—खास तौर पर उन मामलों में, जिनमें जीवित या बचाए गए जानवर शामिल हों, और जिनमें उनके तयशुदा माहौल, कस्टडी और आवास को छेड़ा जाए—अपने आप में क्रूरता मानी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
“इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जीवित जानवरों—जिनमें बचाए गए जानवर भी शामिल हैं—के वैध आयात के बाद उनके तयशुदा माहौल, कस्टडी और परिवेश को छेड़ने का काम अपने आप में क्रूरता का रूप ले सकता है।”
तदनुसार, याचिका ख़ारिज की गई।
Cause Title: KARANARTHAM VIRAMAH FOUNDATION VERSUS UNION OF INDIA & ORS.