COVID-19: सात साल तक की सजा वाले अपराधों में जेल में बंद कैदियों को 8 सप्ताह की अंतरिम जमानत दी जाए : यूपी हाई पावर्ड कमेटी ने सिफारिश की

Update: 2020-03-28 10:48 GMT

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य में एक उच्चाधिकार समिति ने COVID-19 महामारी को देखते हुए जेलों में भीड़ कम करने के लिए कैदियों की एक श्रेणी को पैरोल पर रिहा करने की सिफारिश की है।

सोमवार, 23 मार्च को मुख्य न्यायाधीश एस. ए .बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे 'उच्च स्तरीय समिति गठित करें, जो कैदियों की उस श्रेणी का निर्धारण कर सके, जिनको चार से छह सप्ताह के लिए पैरोल पर रिहा किया जा सके।

यह भी कहा गया था कि जेलों में भीड़ कम करने के लिए उन कैदियों को पैरोल दी जा सकती है, जिनको सात साल तक की सजा हो चुकी है या जिन पर ऐसे आरोपों के तहत केस चल रहा है, जिनमें सात साल तक की सजा का प्रावधान है।

इसी आदेश के तहत यूपी में एक कमेटी का गठन किया गया, जिसमें यूपीएसएलएसए के माननीय कार्यकारी अध्यक्ष, यूपी सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और यूपी के डी.जी.पी. (कारागार) को शामिल किया गया।

इस कमेटी ने सिफारिश की है कि निम्नलिखित श्रेणी के कैदियों (सिवाय ऐसे विचाराधीन कैदी,जो विदेशी नागरिक हैं) को अंतरिम जमानत पर रिहा किया जा सकता है।

'वर्तमान में जेल में बंद ऐसे विचाराधीन कैदी, जिन पर लगे आरोपों में उनको सात साल तक की सजा हो सकती है, उन्हें संबंधित सत्र न्यायालय, अतिरिक्त सत्र न्यायालय या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सहित अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा 8 सप्ताह तक की अंतरित जमानत पर रिहा किया जा सकता है, जैसा भी मामला हो।

इसके लिए व्यक्तिगत बॉन्ड भरवाने के साथ-साथ इन बांड एक अंडरटेकिंग भी लिखवा ली जाए कि वह अंतरिम जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण कर देगा।

मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अगर न्यायालय को उचित लगता है तो वह अन्य शर्त भी लगा सकता है।''

जमानत देने की प्रक्रिया

समिति ने निर्धारित किया है कि अंडर ट्रायल कैदियों की तरफ से दायर किए जाने वाले जमानत आवेदनों का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए जेल अधिकारियों, जेल कर्मचारियों, जेल पैरा लीगल वालंटियर्स (पीएलवी) और संबंधित जिले के डीएलएसए सचिव के साथ मिलकर या उन्हें सूचित करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के पैनल वकीलों की सहायता व सेवा ली जा सकती है।

जमानत की अर्जी दायर करने के बाद , सत्र न्यायाधीश/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट /अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा अंतरिम जमानत दी जा सकती है, जैसा भी मामला हो सकता है।

इसके लिए वैकल्पिक दिनों में जेलों का दौरा किया जा सकता है या जेल जाकर आवेदनों पर विचार किया जा सकता है।

इस काम के लिए जिला प्रशासन द्वारा लॉकडाउन की अवधि के दौरान न्यायाधीशों/मजिस्ट्रेटों और पैनल वकीलों को पास जारी किए जाएं।

पैरोल की स्थिति

पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए, समिति ने निर्धारित किया है कि एक दिन में कितने कैदियों को पैरोल दी गई है और अंतरिम जमानत के लिए कितने आवेदन दायर हुए और उनमें से कितनों को उसी दिन अंतरिम जमानत दे दी गई, इसकी जानकारी अगले दिन ''राज्य स्तरीय निगरानी टीम'' को दी जाएगी।

साथ ही इस जानकारी जेल की आधिकारिक वेबसाइट पर भी प्रकाशित की जाएगी।

igprisons-up@nic.in

इसके अलावा, जेल अधीक्षक संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव साथ निरंतर संपर्क में रहेंगे ताकि उनको विचाराधीन कैदियों की तरफ से दायर आवेदनों के निपटारे के संबंध में जानकारी मिलती रहे और इसके लिए उचित प्रबंध किए जा सकें।

अंत में समिति ने सिफारिश की है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ''1382 जेलों में अमानवीय स्थिति (2016) 3 एससीसी 700'' ( Re Inhuman Conditions in 1382 prisons, (2016) 3 SCC 700) में दिए गए फैसले के तहत बनाई गई अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी को हर सप्ताह बैठक करनी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले के अनुसार संबंधित जिला प्रशासन के परामर्श करके ऐसे निर्णय लेने चाहिए।

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