ऑनलाइन सामग्री हटाने का आदेश मजिस्ट्रेट नहीं दे सकता: बॉम्बे हाइकोर्ट के रुख में हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने वह याचिका खारिज की, जिसमें बॉम्बे हाइकोर्ट की उस प्रारंभिक टिप्पणी को चुनौती दी गई थी कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 (IT Act) की धारा 69ए तथा वर्ष 2009 के नियमों के तहत किसी मजिस्ट्रेट को ऑनलाइन सामग्री हटाने या अवरुद्ध करने का अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने हाइकोर्ट का आदेश बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया कि संबंधित टिप्पणी से याचिकाकर्ता के अन्य दीवानी उपाय प्रभावित नहीं होंगे।
अदालत ने कहा,
“हम हाइकोर्ट द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं देखते। तथापि, यह निर्णय याचिकाकर्ता को विधि के अनुसार दीवानी न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से नहीं रोकेगा। यदि याचिकाकर्ता निर्धारित उपाय अपनाता है तो हाइकोर्ट की टिप्पणियों का मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।”
मामला ध्यान फाउंडेशन से जुड़ा है, जो पशु कल्याण के क्षेत्र में कार्यरत एक पंजीकृत गैर-लाभकारी संस्था है। संस्था ने मुंबई के बैलार्ड पियर स्थित महानगर मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया कि उसके विरुद्ध झूठे और मानहानिकारक आरोपों वाले पांच वीडियो यूट्यूब पर प्रसारित किए जा रहे हैं, जिसका संचालन गूगल एलएलसी द्वारा किया जाता है।
31 मार्च 2023 को मजिस्ट्रेट ने गूगल LLC को उक्त वीडियो हटाने और उनका प्रसारण रोकने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य सरकार को भी IT Act के तहत बनाए गए नियमों के अनुपालन के लिए पत्राचार करने को कहा गया।
वीडियो नहीं हटाए जाने पर संस्था ने मजिस्ट्रेट के आदेश की अवहेलना को लेकर एक और शिकायत दायर की। इसके बाद गूगल LLC ने सेशन कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की। सेशन कोर्ट ने 116 दिनों की देरी को माफ करते हुए अवमानना संबंधी कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाई।
इससे असंतुष्ट होकर संस्था ने बॉम्बे हाइकोर्ट में दो रिट याचिकाएं दायर कीं। पहली याचिका में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने में हुई देरी की माफी को चुनौती दी गई। हाइकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि गूगल द्वारा बताई गई वजहें पूरी तरह अस्थिर नहीं कही जा सकतीं और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे लापरवाही या दुर्भावना सिद्ध हो।
दूसरी याचिका में सेशन कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम रोक को चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान गूगल ने तर्क दिया कि IT Act की धारा 69ए तथा 2009 के नियमों के तहत सामग्री अवरुद्ध करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी को है, मजिस्ट्रेट को नहीं। इस संबंध में त्रिपुरा हाइकोर्ट के निर्णय स्टेट ऑफ त्रिपुरा बनाम श्री सौमेन सरकार का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि नियम 10 मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से अवरोध आदेश देने की शक्ति नहीं देता।
बॉम्बे हाइकोर्ट ने कहा कि धारा 69ए के तहत निर्दिष्ट आधारों पर जानकारी को अवरुद्ध करने की शक्ति केंद्र सरकार को है। इसके लिए 2009 के नियमों में प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय निर्धारित हैं। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका अभी सेशन कोर्ट में लंबित है और रिट चरण में विस्तृत टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
हाइकोर्ट ने प्रारंभिक रूप से माना कि एडिशनल सेशन जज द्वारा अधिकार क्षेत्र के प्रश्न पर व्यक्त दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण नहीं कहा जा सकता। इसी आधार पर देरी की माफी और अंतरिम रोक में हस्तक्षेप से इनकार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के इसी रुख को सही ठहराते हुए याचिका खारिज की। साथ ही स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता विधि के अनुसार दीवानी न्यायालय में उपयुक्त राहत मांग सकता है।