वृंदा करात ने की हेट स्पीच मामले में अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से मिली क्लीन चिट पर पुनर्विचार की मांग
CPI(M) नेता वृंदा करात ने सुप्रीम कोर्ट में 29 अप्रैल के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए याचिका दायर की, जिसमें कहा गया था कि 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के कथित हेट स्पीच (नफरत भरे भाषण) से कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) नहीं बनता।
पुनर्विचार याचिका में फैसले के उस हिस्से को चुनौती दी गई, जिसमें कोर्ट ने यह तो माना कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने का आदेश देने के लिए CrPC की धारा 196 के तहत पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फिर भी कोर्ट इस निष्कर्ष से सहमत रहा कि भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
करात ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा CrPC की धारा 156(3) के तहत बीजेपी नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देने से इनकार करने के फैसले को सही ठहराया गया।
करात ने आरोप लगाया कि 27 जनवरी, 2020 को एक रैली में ठाकुर का "देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को" वाला नारा और CAA विरोध प्रदर्शनों के दौरान शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को "घुसपैठिया" बताने वाले वर्मा के भाषण - जिनमें कहा गया था कि वे "आपके घरों में घुसेंगे और आपकी बेटियों और बहनों के साथ बलात्कार करेंगे और उन्हें मार डालेंगे" - IPC की धारा 153A, 153B, 295A, 505 के तहत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं।
29 अप्रैल को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उनकी याचिका खारिज की और माना कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस विचार का समर्थन किया कि हेट स्पीच का कोई अपराध नहीं बनता, क्योंकि भाषणों में किसी विशेष समुदाय का जिक्र नहीं किया गया।
याचिका के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के आरोपों के गुण-दोष पर फैसला करके "रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि" (error apparent on the face of the record) की, जबकि न तो ट्रायल कोर्ट और न ही दिल्ली हाई कोर्ट ने उन आरोपों की जांच की। इसमें कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के सामने बहस सिर्फ़ इस कानूनी मुद्दे तक सीमित थी कि क्या धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देने से पहले CrPC की धारा 196 के तहत मंज़ूरी ज़रूरी है।
याचिका में कहा गया कि दिल्ली हाई कोर्ट ने खुद को सिर्फ़ मंज़ूरी के मुद्दे पर फ़ैसला करने तक सीमित रखा था और यह दर्ज किया कि एडिशनल चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने "मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया।" इसमें यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि उसके फ़ैसले में की गई कोई भी टिप्पणी भविष्य की किसी भी कार्यवाही में आरोपों के गुण-दोष पर कोई असर नहीं डालेगी।
हालांकि, मंज़ूरी की ज़रूरत पर हाईकोर्ट के नज़रिए को खारिज करते हुए करात की अपील आंशिक रूप से मंज़ूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले के पैराग्राफ 136 से 138 में कहा कि वह इस निष्कर्ष से सहमत है कि "कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है।"
रिव्यू पिटीशन में तर्क दिया गया कि यह निष्कर्ष तथ्यात्मक आरोपों की उचित जांच या गुण-दोष पर विस्तृत बहस सुने बिना दिया गया।
करात ने जनवरी 2020 में ठाकुर और वर्मा के ख़िलाफ़ भारत के चुनाव आयोग द्वारा पारित आदेशों का भी हवाला दिया। याचिका में बताया गया कि चुनाव आयोग ने पाया कि विवादित भाषणों ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया, उनमें मौजूदा मतभेदों को बढ़ाने और धार्मिक समुदायों के बीच आपसी नफ़रत पैदा करने की क्षमता थी और नतीजतन, चुनाव आयोग ने दोनों नेताओं पर प्रचार करने पर रोक लगाते हुए उन्हें बीजेपी के स्टार प्रचारकों की सूची से हटा दिया।
याचिका में आगे कहा गया कि ट्रायल कोर्ट के सामने पेश की गई पुलिस स्टेटस रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, जिसका कारण यह बताया गया कि नारे में किसी खास समुदाय को निशाना नहीं बनाया गया और शाहीन बाग़ के बारे में दिए गए बयान राजनीतिक आलोचना की श्रेणी में आते हैं। करात के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने सामने पेश किए गए सबूतों - जिनमें वीडियो रिकॉर्डिंग और चुनाव आयोग के निष्कर्ष शामिल थे - के बावजूद बिना कोई स्वतंत्र कारण बताए इस निष्कर्ष को दोहराया।
पुनर्विचार की मांग करते हुए रिव्यू पिटीशन में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया कि वह "कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता" वाले अपने निष्कर्ष को वापस ले और इस मुद्दे पर पक्षों को सुनने के बाद हेट स्पीच के आरोपों के गुण-दोष पर फ़ैसला करे।
The Review petition has been filed through Advocate Sylona Mohapatra, Tara Nirula and Adit Pujari